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मद्रास हाईकोर्ट ने विमान हादसों की मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर दिशानिर्देश तय करने की याचिका खारिज की

मद्रास हाईकोर्ट ने विमान दुर्घटनाओं की रिपोर्टिंग पर मीडिया के लिए दिशानिर्देश तय करने की याचिका खारिज की। याचिकाकर्ता ने कहा था कि हादसों के बाद पायलटों पर जल्दबाजी में आरोप लगाना उनके सम्मान और करियर को नुकसान पहुंचाता है।

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मद्रास हाईकोर्ट ने विमान हादसों की मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर दिशानिर्देश तय करने की याचिका खारिज की

मद्रास हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें विमान हादसों के बाद मीडिया रिपोर्टिंग के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग की गई थी। यह याचिका अधिवक्ता एम. प्रविण द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि विमान दुर्घटनाओं के बाद मीडिया द्वारा पायलटों को बिना जांच के दोषी ठहराया जाता है, जिससे उनकी छवि, करियर और व्यक्तिगत गरिमा को गंभीर नुकसान होता है।

मुख्य न्यायाधीश एम.एम. श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुंदर मोहन की खंडपीठ ने यह याचिका खारिज करते हुए कहा:

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"ऐसे मामलों में मीडिया रिपोर्टिंग को नियंत्रित करने के लिए दिशानिर्देश तय करने के लिए अदालत की कोई कानूनी बाध्यता नहीं बनती है।"

याचिका में विशेष रूप से हाल ही में हुई अहमदाबाद विमान दुर्घटना का उल्लेख करते हुए कहा गया कि मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अक्सर जांच पूरी होने से पहले ही पायलटों को दोषी ठहरा दिया जाता है।

इस तरह की असत्यापित और पूर्वाग्रही रिपोर्टिंग से न केवल पायलट की प्रतिष्ठा और करियर को नुकसान होता है, बल्कि विमानन व्यवस्था में जनता का विश्वास भी कमजोर होता है, याचिकाकर्ता ने कहा।

प्रविण ने यह भी तर्क दिया कि इस प्रकार की रिपोर्टिंग निर्दोषता की धारणा के सिद्धांत का उल्लंघन करती है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और 21 के तहत प्राप्त गरिमा और निजता के मौलिक अधिकारों का हनन करती है।

याचिका में मानवीय पक्ष भी उठाया गया था। याचिकाकर्ता ने कहा कि कई मामलों में जब पायलट की मृत्यु हो जाती है, तो मीडिया की ऐसी रिपोर्टिंग से उनके परिवार को भी अपमान और मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है।

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"जब किसी पायलट की हादसे में जान चली जाती है, तब मीडिया द्वारा लगाए गए आरोप उनके परिवार को और अधिक पीड़ा और अपमान देते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित गरिमा और सहानुभूति के सिद्धांतों के खिलाफ है," याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया।

उन्होंने अदालत से अपील की कि नागरिक उड्डयन और डिजिटल मंत्रालयों को मिलकर ऐसे तंत्र विकसित करने चाहिए जिससे जिम्मेदार और नैतिक रिपोर्टिंग को बढ़ावा मिले। याचिका का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि रिपोर्टिंग निष्पक्ष हो और जांच पूरी होने से पहले किसी पर आरोप न लगे।

हालांकि, अदालत इन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुई।

जब तक किसी संवैधानिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन या किसी कानून का उल्लंघन न हो, तब तक ऐसी व्यापक नीति-निर्धारण संबंधी मांगों में न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, कोर्ट ने टिप्पणी की।

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इसके साथ ही मद्रास हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी और मीडिया की जवाबदेही तथा रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी संबंधित एजेंसियों और मीडिया संगठनों पर छोड़ दी।

मामले का शीर्षक: एम. प्रविण बनाम सचिव, नागरिक उड्डयन मंत्रालय एवं अन्य
मामला संख्या: डब्ल्यूपी नं. 26535 / 2025

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