मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि केवल कई राज्यों में शिकायतें दर्ज होने भर से किसी आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 111 के तहत “संगठित अपराध” का आरोप नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने माना कि इस धारा को लगाने के लिए कानून में तय शर्तों का पूरा होना जरूरी है।
जस्टिस गजेन्द्र सिंह की एकलपीठ ने हीरालाल नामक आरोपी की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ BNS की धारा 111(4) के तहत लगाए गए आरोप हटा दिए, जबकि धोखाधड़ी और अन्य संबंधित धाराओं में ट्रायल जारी रखने की अनुमति दी।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला इंदौर क्राइम ब्रांच में दर्ज एक साइबर फ्रॉड FIR से जुड़ा है। शिकायतकर्ता अमित उपाध्याय ने आरोप लगाया था कि “UBS Securities” नाम के व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए उसे शेयर बाजार में निवेश पर भारी मुनाफे का लालच दिया गया और अलग-अलग बैंक खातों में कुल 26.55 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए गए।
जांच के दौरान पुलिस ने दावा किया कि आरोपी हीरालाल अन्य सह-आरोपियों के संपर्क में था और कथित तौर पर बैंक खाते उपलब्ध कराने तथा रकम के लेन-देन में उसकी भूमिका सामने आई। पुलिस ने यह भी बताया कि कथित फ्रॉड से जुड़े बैंक खातों और मोबाइल नंबरों के खिलाफ देश के अलग-अलग राज्यों में 28 शिकायतें दर्ज मिलीं।
ट्रायल कोर्ट ने मई 2025 में आरोपी के खिलाफ BNS की धारा 318(4), 316(5) और 111(4) के तहत आरोप तय किए थे, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की गई।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, कॉल रिकॉर्ड या आपराधिक इतिहास नहीं है। यह भी कहा गया कि केवल सह-आरोपियों के कथनों के आधार पर “ऑर्गनाइज्ड क्राइम” की धारा नहीं लगाई जा सकती।
अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चार्ज फ्रेम करते समय अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। हालांकि, गंभीर आरोप लगाने के लिए कानूनी आवश्यकताओं का पूरा होना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा,
“बीएनएस, 2023 की धारा 111 को केवल तभी लागू किया जा सकता है जब निरंतर गैरकानूनी गतिविधि और संगठित अपराध सिंडिकेट के संबंध में वैधानिक आवश्यकताएं पूरी हों।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 111 लागू करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी किसी संगठित अपराध सिंडिकेट का हिस्सा था और उसके खिलाफ पिछले दस वर्षों में एक से अधिक चार्जशीट दायर हो चुकी हों, जिन पर सक्षम अदालत संज्ञान ले चुकी हो।
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन द्वारा पेश की गई सामग्री फिलहाल केवल जांच और शिकायतों तक सीमित है और इससे BNS की धारा 111 के लिए जरूरी कानूनी मानदंड पूरे नहीं होते। अदालत ने कहा कि यदि आगे की जांच में पर्याप्त सामग्री मिलती है तो पुलिस पूरक चालान दाखिल कर अतिरिक्त आरोप लगाने की मांग कर सकती है।
इसके साथ ही कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह भी निर्देश दिया कि वह BNS की धारा 112, यानी “पेटी ऑर्गनाइज्ड क्राइम”, की संभावित प्रयोज्यता पर दोनों पक्षों को सुनकर नया आदेश पारित करे।
अंततः अदालत ने आरोपी के खिलाफ धारा 111(4) के आरोप निरस्त करते हुए पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से मंजूर कर ली।
Case Details
Case Title: Hiralal vs State of Madhya Pradesh
Case Number: Criminal Revision No. 3881 of 2025
Judge: Justice Gajendra Singh
Decision Date: 30 April 2026











