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पति की पुनर्मिलन में अनिच्छा को ‘गलत’ नहीं ठहराया जा सकता जब तक गंभीर दुराचार साबित न हो: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पति को तलाक देते हुए कहा कि केवल साथ रहने में अनिच्छा दिखाना ऐसा ‘गलत आचरण’ नहीं है जिससे तलाक रोका जा सके।

Shivam Y.
पति की पुनर्मिलन में अनिच्छा को ‘गलत’ नहीं ठहराया जा सकता जब तक गंभीर दुराचार साबित न हो: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1A)(ii) के तहत पति की तलाक याचिका मंजूर करते हुए कहा कि केवल पति की ओर से साथ रहने में अनिच्छा दिखाना ऐसा “गलत आचरण” नहीं माना जा सकता, जिसके आधार पर उसे तलाक से वंचित किया जाए। अदालत ने पाया कि पत्नी यह साबित नहीं कर सकी कि पति ने वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) के आदेश का पालन जानबूझकर रोका था।

यह फैसला न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम की पीठ ने 28 अप्रैल, 2026 को सुनाया था।

मामले की पृष्ठभूमि

दोनों पक्षों की शादी 5 फरवरी 1992 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी और उनका एक बेटा भी है। वैवाहिक विवाद बढ़ने के बाद पति ने पहले तलाक की याचिका दायर की थी, जबकि पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की मांग की थी।

साल 2001 में फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन पत्नी की पुनर्स्थापना याचिका स्वीकार कर ली थी। पति का कहना था कि आदेश पारित होने के बाद भी एक वर्ष से अधिक समय तक दोनों के बीच साथ रहना शुरू नहीं हुआ, इसलिए उसे धारा 13(1A)(ii) के तहत तलाक मांगने का अधिकार मिल गया।

वहीं पत्नी ने दावा किया कि उसने कई बार पति के घर लौटने की कोशिश की, लेकिन पति ने उसे स्वीकार नहीं किया।

तिरुपति फैमिली कोर्ट ने 2004 में पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। ट्रायल कोर्ट ने पत्नी और उसके गवाहों की गवाही को स्वीकार करते हुए कहा था कि पति की मंशा पुनर्स्थापना आदेश का पालन करने की नहीं थी।

फैमिली कोर्ट ने माना था कि पति अपने ही आचरण का लाभ लेकर तलाक नहीं मांग सकता।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की दोबारा जांच की और पाया कि पत्नी के गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास थे। अदालत ने कहा कि यह साबित नहीं हो पाया कि पति ने जानबूझकर पत्नी को अपने साथ रहने से रोका था।

खंडपीठ ने कहा कि अधिकतम यह माना जा सकता है कि पति साथ रहने के लिए इच्छुक नहीं था, लेकिन केवल इतनी बात को कानून के तहत “गलत आचरण” नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा,

“सिर्फ पुनर्मिलन के प्रस्ताव को स्वीकार करने में अनिच्छा दिखाना ऐसा आचरण नहीं है, जिसके आधार पर वैधानिक राहत से इनकार किया जाए।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी ने पुनर्स्थापना आदेश को लागू कराने के लिए कभी निष्पादन कार्यवाही (Execution Proceedings) शुरू नहीं की, जबकि कानून में उसका प्रावधान मौजूद था।

अदालत ने यह भी नोट किया कि यह अपील 2004 से लंबित थी और इतने लंबे समय में दोनों पक्षों की ओर से साथ रहने का कोई वास्तविक प्रयास रिकॉर्ड पर नहीं आया।

हाईकोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का 6 अगस्त 2004 का आदेश रद्द कर दिया और 5 फरवरी 1992 को हुई शादी को भंग घोषित कर दिया। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1A)(ii) के तहत तलाक का आधार स्पष्ट रूप से बनता है और पति को धारा 23(1)(a) के आधार पर राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।

Case Details

Case Title: Husband v Wife

Case Number: Civil Miscellaneous Appeal No. 4279 of 2004

Judges: Justice Ravi Nath Tilhari and Justice Maheswara Rao Kuncheam

Decision Date: April 28, 2026

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