पटना उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि सरकारी अधिकारियों का तबादला करना कार्यपालिका (सरकार) का विशेष अधिकार है और अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जब तक कोई गंभीर कानूनी आधार न हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक जब्त वाहन (हाइवा ट्रक) से जुड़ा है, जिसे 2015 में बिना वैध चालान के पत्थर ढोने के आरोप में वन विभाग ने जब्त किया था। बाद में इस वाहन को जब्ती कार्यवाही के तहत कुर्क कर लिया गया।
वाहन मालिक दीपक कुमार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए पहले अपील और फिर पुनरीक्षण दायर किया, लेकिन दोनों ही स्तरों पर उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की।
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इस दौरान, वाहन को सार्वजनिक नीलामी में बेच दिया गया। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने नीलामी नोटिस को चुनौती नहीं दी और न ही इस दौरान कोई स्थगन आदेश (stay) प्राप्त किया।
खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता तीन अलग-अलग मंचों पर अपना मामला हार चुका था। ऐसे में यदि वाहन की नीलामी हुई, तो इसमें प्रशासन की कोई गलती नहीं पाई जा सकती।
अदालत ने यह भी नोट किया कि जिस अधिकारी (डीएफओ) के खिलाफ सिंगल जज ने तबादले का निर्देश दिया था, वह उस समय पद पर थे ही नहीं जब जब्ती आदेश पारित हुआ था।
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पीठ ने कहा,
“सरकारी कर्मचारी का तबादला सेवा का सामान्य हिस्सा है और यह पूरी तरह नियोक्ता (सरकार) के अधिकार क्षेत्र में आता है।”
आगे यह भी कहा गया,
“अदालत को नियोक्ता की भूमिका नहीं निभानी चाहिए, अन्यथा प्रशासनिक व्यवस्था में अव्यवस्था फैल सकती है।”
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न्यायालय ने पाया कि सिंगल जज द्वारा डीएफओ के तबादले का निर्देश देना न्यायिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण था और इसमें कोई ठोस कानूनी आधार नहीं था।
इसलिए, अदालत ने 12 जनवरी 2026 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें संबंधित डीएफओ को मुख्यालय स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया था।
अंततः, राज्य सरकार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई और सिंगल जज का आदेश निरस्त कर दिया गया।
Case Details
Case Title: State of Bihar & Ors. vs Deepak Kumar @ Deepak Kumar Singh
Case Number: Letters Patent Appeal No. 34 of 2026
Court: Patna High Court
Bench: Chief Justice Sangam Kumar Sahoo & Justice Harish Kumar
Decision Date: April 2, 2026