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सुप्रीम कोर्ट ने निठारी हत्याकांड में सुरेंद्र कोली की अंतिम दोषसिद्धि को खारिज कर दिया, क्योंकि उसने पहले के साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने निठारी कांड में सुरेंद्र कोली की पिछली सजा को अविश्वसनीय सबूतों का हवाला देते हुए पलट दिया। पीठ ने पहले के निष्कर्षों पर सवाल उठाए और कहीं और वांछित न होने पर तुरंत रिहाई का आदेश दिया। - सुरेंद्र कोली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट ने निठारी हत्याकांड में सुरेंद्र कोली की अंतिम दोषसिद्धि को खारिज कर दिया, क्योंकि उसने पहले के साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे।

नई दिल्ली, 11 नवंबर, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कुख्यात निठारी हत्याकांड में सुरेंद्र कोली की एकमात्र जीवित बची हुई सज़ा को आखिरकार रद्द कर दिया। पीठ की ओर से बोलते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने जब कहा, "कोली को इस अपील में सभी आरोपों से बरी किया जाता है," तो अदालत कक्ष में असामान्य रूप से सन्नाटा छा गया यह वाक्य उस पर मंडरा रहे लगभग दो दशक लंबे कानूनी साये के खत्म होने का संकेत था।

पृष्ठभूमि

निठारी हत्याकांड 2006 की सबसे भयावह अपराध कहानियों में से एक था, जब नोएडा के निठारी गांव में एक घर के पीछे बच्चों और महिलाओं के कंकाल अवशेष मिले थे। कारोबारी मोनिंदर सिंह पंधेर के घर में घरेलू सहायक के रूप में काम करने वाले कोली को कुछ ही दिनों में गिरफ्तार कर लिया गया।

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CBI, जिसने बाद में जांच संभाली, ने कोली के खिलाफ 16 मामले दर्ज किए और उसे कई हत्याओं की श्रृंखला का मुख्य आरोपी बताया। लेकिन समय के साथ अभियोजन की कई दलीलें अदालत में डगमगाने लगीं। 60 दिनों से ज्यादा की हिरासत के बाद दिया गया स्वीकारोक्ति बयान, विवादित रिकवरी और जगह की गैर-विशिष्ट पहुंच ये सब सबूत अदालतों में कमजोर साबित हुए।

आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे सभी मामलों में बरी कर दिया, सिवाय एक के। अदालत ने CBI की जांच को “खराब” कहा और यह भी टिप्पणी की कि कथित अवैध अंग व्यापार के कोण की जांच ही नहीं की गई। पंधेर, जिसे कभी बराबर दोषी माना जाता था, जुलाई में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी अपीलें खारिज किए जाने के बाद पूरी तरह बरी हो गया।

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अदालत की टिप्पणियाँ

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ—ने भी उन चिंताओं को दोहराया, जिन्हें पहले की अदालतें उठा चुकी थीं। एक समय पर जजों ने कहा कि बाकी 12 मामलों में बरी होने के बाद केवल एक मामले में सजा बरकरार रखना “विसंगत स्थिति” पैदा करता है, क्योंकि सबूत लगभग समान थे।

पीठ ने टिप्पणी की,

"यदि एक ही तरह के सबूत पहले ही अविश्वसनीय घोषित हो चुके हैं, तो एक सजा को बनाए रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा," - यह वाक्य सुनते ही अदालत में मौजूद लोगों में हलचल बढ़ गई।

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अदालत ने यह भी याद दिलाया कि कथित बरामदगी उस स्थान से दिखाई गई थी, जो केवल आरोपी की विशिष्ट पहुंच में नहीं था। शुरुआती जांच और ट्रायल के दौरान मीडिया दबाव के असर पर भी एक तरह की सावधानी झलक रही थी।

निर्णय

आदेश के महत्वपूर्ण हिस्से को सुनाते हुए न्यायमूर्ति नाथ ने स्पष्ट कहा कि 2011 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जिसमें कोली की सजा को बरकरार रखा गया था, और 2014 का समीक्षा याचिका खारिज करने वाला आदेश, “रद्द और निरस्त” किए जाते हैं।

पीठ ने कोली की आपराधिक अपील स्वीकार कर ली और 2009 की सेशन कोर्ट की सजा को भी पलट दिया। इसके साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि सुरेंद्र कोली को “यदि किसी अन्य मामले में वांछित न हों तो तुरंत रिहा किया जाए।”

Case Title: Surendra Koli v. State of UP

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