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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एलिगेंट डेवलपर्स के भूमि सौदों पर कोई सेवा कर नहीं लगेगा, सहारा का लेनदेन वास्तविक बिक्री था, न कि रियल एस्टेट एजेंसी सेवा

सर्वोच्च न्यायालय ने एलिगेंट डेवलपर्स पर सेवा कर की मांग को खारिज कर दिया, यह फैसला देते हुए कि भूमि लेनदेन वास्तविक बिक्री थी, न कि रियल एस्टेट सेवाएं, जिससे रियल एस्टेट कराधान के लिए बड़ी स्पष्टता मिलती है। - सेवा कर आयुक्त, नई दिल्ली बनाम मेसर्स एलिगेंट डेवलपर्स

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एलिगेंट डेवलपर्स के भूमि सौदों पर कोई सेवा कर नहीं लगेगा, सहारा का लेनदेन वास्तविक बिक्री था, न कि रियल एस्टेट एजेंसी सेवा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसका प्रभाव रियल एस्टेट क्षेत्र में दूर तक महसूस किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि एलीगेंट डेवलपर्स और सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड (SICCL) के बीच हुए सौदे असल में सीधे-सीधे भूमि बिक्री थे न कि कोई टैक्स योग्य रियल एस्टेट सेवाएं। सुनवाई के दौरान, लगभग दो घंटे तक बहस चली और बेंच का ध्यान पूरी तरह समझौतों की प्रकृति पर केंद्रित रहा।

एक क्षण पर बेंच ने टिप्पणी की,

“राजस्व विभाग को लेनदेन को जैसा है वैसा देखना चाहिए - न कि जैसा वह मानना चाहता है।”

कोर्टरूम का माहौल गंभीर मगर संतुलित रहा। दोनों पक्षों के वकीलों ने 2002 से 2005 के बीच हुए तीन प्रमुख समझौतों (MoUs) की बारीकियों पर काफी ज़ोर दिया।

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पृष्ठभूमि

यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब केंद्रीय उत्पाद शुल्क खुफिया महानिदेशालय को सूचना मिली कि एलीगेंट डेवलपर्स ने SICCL के लिए “रियल एस्टेट एजेंट” के रूप में कार्य किया है। फर्म ने श्रीगंगानगर, वडोदरा और कुरुक्षेत्र में सहारा प्रोजेक्ट्स के लिए भूमि की व्यवस्था की। इसी आधार पर 2010 में दस करोड़ रुपये से अधिक के सर्विस टैक्स की मांग करते हुए नोटिस जारी किया गया।

आयुक्त ने भारी जुर्माने लगाए और यह निष्कर्ष निकाला कि कंपनी ने भूमि खरीद लागत और “फिक्स्ड एवरेज रेट” के बीच के अंतर से कमाई की, जो कथित रूप से कमीशन जैसा था।

लेकिन फर्म का कहना था कि उसका काम बस भूमि खरीदना, उसे जोड़ना और आगे बेचना था - लाभ या हानि पूरी तरह उसके जोखिम पर। कोई सेवा नहीं, कोई परामर्श नहीं, कोई एजेंसी नहीं। बस भूमि का सौदा।

न्यायालय की टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने समझौतों की संरचना को गहराई से देखा। MoUs पढ़ते हुए बेंच ने कहा कि एलीगेंट डेवलपर्स ने पूरी तरह जोखिम उठाया था।

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"एक रियल एस्टेट एजेंट जोखिम नहीं उठाता… यहां तो उत्तरदाता को नुकसान भी हो सकता था," बेंच की टिप्पणी आई।

एक और महत्वपूर्ण बात स्वामित्व से संबंधित थी। हालांकि डेवलपर भूमि की बातचीत और खरीद की प्रक्रिया संभाल रहा था, उसने किसी प्रकार की अलग सेवा-शुल्क या परामर्श शुल्क नहीं लिया। कोर्ट ने कहा, "MoUs में कोई निर्धारित कमीशन, परामर्श शुल्क या सर्विस फीस का उल्लेख नहीं है।" बेंच ने स्पष्ट किया कि सर्विस टैक्स तभी लगेगा जब सेवा प्रदान की जाए। सरल शब्दों में: ज़मीन बेचना सेवा नहीं - लेनदेन है।

दूसरे मुद्दे पर क्या विस्तारित समयसीमा लागू होती है न्यायाधीश समान रूप से स्पष्ट थे। “सभी लेनदेन बैंकिंग चैनलों से हुए। कोई साक्ष्य नहीं कि जानबूझकर कुछ छुपाया गया,” उन्होंने कहा। कोर्ट ने दोहराया कि केवल टैक्स न चुका पाने से विस्तारित सीमा लागू नहीं होती इरादे का प्रमाण चाहिए।

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फ़ैसला

विस्तृत विश्लेषण के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आयुक्त की अपीलों को खारिज करते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा, “ये लेनदेन ‘रियल एस्टेट एजेंट’ या ‘रियल एस्टेट कंसल्टेंट’ की परिभाषा में नहीं आते। ये भूमि बिक्री हैं, जिन्हें सर्विस टैक्स से संवैधानिक रूप से संरक्षण प्राप्त है।”

इसके साथ ही पूरी मांग - कर, ब्याज, जुर्माना - खत्म हो गई। मामला यहीं समाप्त कर दिया गया, क्योंकि कोर्ट ने किसी और हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

Case Title: Commissioner of Service Tax, New Delhi vs. M/s Elegant Developers

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