सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में अहम फैसला सुनाया गया। अदालत ने साफ कहा कि अगर मृतक की आय और भविष्य की कमाई से जुड़ा ठोस सबूत रिकॉर्ड पर मौजूद हो, तो मुआवजा तय करते समय उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसी के साथ कोर्ट ने पीड़ित परिवार को मिलने वाली राशि लगभग दोगुनी कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला तमिलनाडु के चेन्नई से जुड़ा है। 9 जून 2011 को डी. वेलु नामक व्यक्ति दोपहिया वाहन से जा रहे थे, तभी एक टैंकर लॉरी ने लापरवाही से टक्कर मार दी। हादसा इतना गंभीर था कि वेलु की मौके पर ही मौत हो गई। उस समय उनकी उम्र करीब 37 साल थी।
Read also:- 'भगोड़ापन' का आरोप गलत था: राजस्थान उच्च न्यायालय ने सीआरपीएफ कांस्टेबल की बहाली का आदेश दिया
वेलु के पीछे उनकी पत्नी, दो छोटे बच्चे और माता-पिता रह गए। परिवार ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) में दावा दाखिल कर ₹20 लाख मुआवजे की मांग की। उनका कहना था कि वेलु पेशे से ड्राइवर थे और ₹10,000 मासिक कमाते थे।
ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट का फैसला
MACT ने माना कि दुर्घटना लॉरी चालक की लापरवाही से हुई, लेकिन आय का पुख्ता दस्तावेज न मानते हुए मासिक कमाई ₹6,000 तय की। इसके आधार पर कुल मुआवजा ₹9.37 लाख तय हुआ।
इसके खिलाफ परिवार मद्रास हाई कोर्ट गया। हाई कोर्ट ने आय ₹7,000 मानते हुए मुआवजा बढ़ाकर ₹10.51 लाख कर दिया, लेकिन भविष्य की आय (future prospects) को शामिल नहीं किया। इसी बात से असंतुष्ट होकर पीड़ित परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने रिकॉर्ड पर मौजूद सैलरी सर्टिफिकेट और नियोक्ता के हलफनामे पर विशेष ध्यान दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि जब दस्तावेज़ स्पष्ट रूप से ₹10,000 मासिक वेतन दिखाते हैं, तो कम आय मानना गलत है।
पीठ ने टिप्पणी की, “मुआवजा कोई दया नहीं, बल्कि कानून के तहत दिया जाने वाला न्यायसंगत अधिकार है।”
भविष्य की आय पर अदालत की राय
कोर्ट ने कहा कि ‘भविष्य की आय’ अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि संविधान पीठ के फैसलों के बाद एक अनिवार्य तत्व है। चूंकि मृतक 40 वर्ष से कम उम्र के थे और तय वेतन पर काम कर रहे थे, इसलिए उनकी आय में 40% की बढ़ोतरी जोड़ी जानी चाहिए।
अदालत के शब्दों में, “भविष्य की संभावनाओं को न जोड़ना कानून की स्पष्ट अवहेलना है।”
बीमा कंपनी की दलील पर कोर्ट ने सहमति जताई कि “loss of love and affection” के नाम से अलग मुआवजा नहीं दिया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह भावनात्मक नुकसान ‘consortium’ के अंतर्गत कवर होता है, जिसमें पत्नी, बच्चों और माता-पिता सभी शामिल हैं।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने मृतक की मासिक आय ₹10,000 मानते हुए, भविष्य की आय जोड़कर और सही गुणक (multiplier) लगाकर कुल मुआवजा ₹20,80,000 तय किया। साथ ही निर्देश दिया कि इस पूरी राशि पर दावा दायर करने की तारीख से 9% वार्षिक ब्याज भी दिया जाए।
अदालत ने बीमा कंपनी को 12 सप्ताह के भीतर शेष राशि चुकाने का आदेश दिया और इसके साथ ही अपील का निपटारा कर दिया।
Case Title: V. Pathmavathi & Ors. vs Bharthi AXA General Insurance Co. Ltd.
Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 23880 of 2022
Decision Date: 06 February 2026










