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बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 18 साल पुराने पीडब्ल्यूडी रिश्वत मामले में कर्मचारी बरी, मंजूरी और मांग दोनों पर सवाल

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 18 साल पुराने PWD रिश्वत मामले में दोषसिद्धि रद्द की, कहा-मंजूरी अवैध, रिश्वत की मांग साबित नहीं।

Vivek G.
बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 18 साल पुराने पीडब्ल्यूडी रिश्वत मामले में कर्मचारी बरी, मंजूरी और मांग दोनों पर सवाल

औरंगाबाद पीठ में बुधवार को माहौल कुछ अलग था। लंबे समय से लंबित एक आपराधिक अपील पर आखिरकार विराम लगा। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) के एक जूनियर क्लर्क को 2007 की भ्रष्टाचार सजा से मुक्त कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि इस मामले में न तो अभियोजन की अनुमति (sanction) कानून के मुताबिक थी और न ही रिश्वत की मांग ठोस रूप से साबित हो पाई।

पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 2004 का है। जलना जिले में तैनात एक चौकीदार ने आरोप लगाया था कि उसके सेवा पुस्तक (service book) में प्रविष्टियां करने के बदले उससे ₹1500 की मांग की गई। शिकायत के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो ने जाल बिछाया, नोटों पर पाउडर लगाया गया और आरोपी को रंगे हाथों पकड़े जाने का दावा किया गया।

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इसके आधार पर विशेष न्यायाधीश, जलना ने 2007 में आरोपी कर्मचारी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया और एक साल की सजा सुनाई। उसी फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख किया।

अदालत की टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुशील एम. घोडेस्वर ने अभियोजन के दस्तावेजों और गवाहियों को बारीकी से परखा। अदालत का मुख्य फोकस दो बिंदुओं पर रहा-मुकदमा चलाने की वैध अनुमति और रिश्वत की मांग।

अदालत ने पाया कि अभियोजन की अनुमति देने वाले अधिकारी ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने पुलिस द्वारा भेजे गए ड्राफ्ट के आधार पर ही मंजूरी दी। इस पर पीठ ने टिप्पणी की, “मंजूरी देना कोई औपचारिक मुहर नहीं है, इसके लिए स्वतंत्र सोच जरूरी है।”

रिश्वत की मांग को लेकर भी गवाहों के बयानों में कई खामियां सामने आईं। शिकायत, पंचनामा और गवाहों की गवाही आपस में पूरी तरह मेल नहीं खा रही थी। अदालत ने दो टूक कहा, “सिर्फ पैसे की बरामदगी से भ्रष्टाचार साबित नहीं होता, मांग का प्रमाण अनिवार्य है।”

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निर्णय

इन सभी पहलुओं को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर सका। न तो वैध मंजूरी थी और न ही रिश्वत मांग का भरोसेमंद सबूत। नतीजतन, अदालत ने 2007 का दोषसिद्धि आदेश रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया। साथ ही जमानत बांड रद्द करने, जमा जुर्माना लौटाने और रिकॉर्ड निचली अदालत को भेजने का निर्देश दिया।

Case Title: Dadasaheb Dagdurao More vs State of Maharashtra

Case No.: Criminal Appeal No. 91 of 2007

Case Type: Criminal Appeal (Prevention of Corruption Act)

Decision Date: 24 December 2025

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