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वोक्सवैगन के Rs11,700 करोड़ टैक्स विवाद की सुनवाई 17 फरवरी को बॉम्बे हाई कोर्ट में

बॉम्बे हाई कोर्ट 17 फरवरी को स्कोडा वोक्सवैगन इंडिया के ₹11,700 करोड़ कस्टम ड्यूटी मामले की सुनवाई करेगा। केस की पूरी जानकारी, तर्क और प्रभाव जानें।

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वोक्सवैगन के Rs11,700 करोड़ टैक्स विवाद की सुनवाई 17 फरवरी को बॉम्बे हाई कोर्ट में

बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्कोडा वोक्सवैगन इंडिया के ₹11,700 करोड़ (1.4 बिलियन डॉलर) के कस्टम ड्यूटी विवाद की सुनवाई 17 फरवरी को तय की है। भारतीय कस्टम अधिकारियों का आरोप है कि कंपनी ने आयातित कार पार्ट्स को गलत तरीके से "व्यक्तिगत पुर्जे" बताकर कम ड्यूटी चुकाई, जबकि उन्हें "कंप्लीटली नॉक्ड डाउन" (सीकेडी) यूनिट्स के तहत उच्च ड्यूटी देनी चाहिए थी।

मामले की पृष्ठभूमि

न्यायमूर्ति बीपी कोलाबावाल्ला और न्यायमूर्ति फिरदोश पूनीवाल्ला की डिवीजन बेंच ने इस मामले को त्वरित सुनवाई के लिए स्वीकार किया, जिसे वोक्सवैगन के वकीलों नरेश ठक्कर और गोपाल मुंदड़ा ने गुरुवार को कोर्ट में उठाया। विवाद का मुख्य बिंदु यह है कि क्या वोक्सवैगन ने 2011 से 2024 के बीच ऑडी, स्कोडा और वोक्सवैगन कारों के पुर्जों को "सीकेडी यूनिट्स" की बजाय "व्यक्तिगत पुर्जे" घोषित कर गलत वर्गीकरण किया।

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डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (डीआरआई) के अनुसार, वोक्सवैगन एक दशक से अधिक समय तक लगभग पूरी कारों को अलग-अलग शिपमेंट में आयात करता रहा और उन पर सिर्फ 5–15% ड्यूटी चुकाई। अधिकारियों का कहना है कि सीकेडी यूनिट्स, जिन्हें असेंबल करने में कम मेहनत लगती है, पर 30–35% ड्यूटी लागू होती है।

"वोक्सवैगन ने सीकेडी दरों से बचने के लिए कारों को टुकड़ों में आयात किया। हमारे पास इस दावे को साबित करने के लिए निजी रिकॉर्ड्स हैं," कस्टम विभाग के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन वेंकटरमन ने कोर्ट में कहा।

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वोक्सवैगन का पक्ष:

कंपनी का कहना है कि सीकेडी नियम 2002 में बने और 2011 तक इनकी परिभाषा स्पष्ट नहीं थी। वकीलों ने दावा किया कि 2011 में टैक्स अधिकारियों से मिले स्पष्टीकरण के आधार पर ही कंपनी ने पुर्जों का वर्गीकरण किया था।

"डीआरआई सीकेडी नियमों की व्याख्या बदल रहा है। हमारा क्लाइंट मौजूदा दिशा-निर्देशों का पालन करता रहा," वोक्सवैगन के वकीलों ने जोर दिया।

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यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

वित्तीय प्रभाव: ₹11,700 करोड़ का जुर्माना वोक्सवैगन के भारतीय संयंत्रों—चाकन (पुणे) और शेंद्रा (छत्रपती संभाजीनगर)—पर गंभीर असर डाल सकता है।

कानूनी नजीर: यह फैसला भविष्य में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आयात वर्गीकरण और टैक्स भुगतान को प्रभावित करेगा।

समयसीमा पर सवाल: डीआरआई की 10 साल की जांच और देरी से जारी नोटिस पर पारदर्शिता के सवाल उठे हैं।

17 फरवरी की सुनवाई में कोर्ट यह तय करेगा कि कस्टम विभाग के दावे कानूनी रूप से वैध हैं या नहीं।

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