करीब तीन दशक से लंबित एक ज़मीन विवाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि मुकदमे के दौरान खरीदी गई संपत्ति (lis pendens) पर अदालत की डिक्री पूरी तरह लागू होगी। अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए बाद में ज़मीन खरीदने वालों की आपत्तियों को खारिज कर दिया और डिक्री धारक को कब्ज़ा दिलाने का रास्ता साफ कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद पुणे की एक ज़मीन से जुड़ा है। वर्ष 1973 में ज़मीन बेचने का एक समझौता हुआ था, लेकिन तय समय पर बिक्री नहीं हो सकी। इसके बाद 1986 में खरीदार ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया और बिक्री व कब्ज़े की मांग की।
मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, मूल मालिक ने 1987 में उसी ज़मीन के अलग-अलग हिस्से कई लोगों को बेच दिए। बाद में, 1990 में सिविल कोर्ट ने खरीदार के पक्ष में विशेष निष्पादन (specific performance) की डिक्री पारित की और आदेश दिया कि बिक्री विलेख निष्पादित कर ज़मीन का कब्ज़ा दिया जाए।
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कार्यवाही और लंबा कानूनी संघर्ष
डिक्री के बाद भी मामला यहीं नहीं रुका। अदालत के आदेश पर 1993 में कोर्ट कमिश्नर ने बिक्री विलेख निष्पादित किया, लेकिन कब्ज़ा देने की प्रक्रिया बार-बार बाधित होती रही।जिन लोगों ने मुकदमे के दौरान ज़मीन खरीदी थी, उन्होंने खुद को मालिक बताते हुए निष्पादन कार्यवाही का विरोध किया। उनका तर्क था कि उन्हें बिक्री विलेख में पक्षकार नहीं बनाया गया, इसलिए डिक्री उन पर लागू नहीं हो सकती।
निचली अदालतों से लेकर हाईकोर्ट तक, उनकी आपत्तियां लगातार खारिज होती रहीं। अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 52 यानी lis pendens सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा की। पीठ ने साफ कहा कि मुकदमे के लंबित रहते हुए की गई बिक्री अवैध नहीं होती, लेकिन वह अंतिम अदालत के फैसले के अधीन रहती है।
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अदालत ने कहा,
“मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदने वाला व्यक्ति, चाहे उसे जानकारी हो या न हो, अंतिम डिक्री से बंधा रहेगा।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निष्पादन अदालत डिक्री के पीछे नहीं जा सकती। जब एक बार विशेष निष्पादन की डिक्री अंतिम रूप ले चुकी हो, तो बाद के खरीदार उस पर कब्ज़ा रोकने का अधिकार नहीं जता सकते।
बाद के खरीदारों की दलीलें क्यों खारिज हुईं
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जिन लोगों ने 1987 में या उसके बाद ज़मीन खरीदी, वे सभी मुकदमे के दौरान खरीदार थे। ऐसे में वे मूल मालिक से बेहतर अधिकार का दावा नहीं कर सकते।
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अदालत ने कहा कि अगर ऐसे खरीदारों को संरक्षण दिया जाए, तो यह कानून की मंशा के खिलाफ होगा और वर्षों तक डिक्री के निष्पादन को टाला जा सकेगा।
अदालत का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 19 दिसंबर 2024 के फैसले को सही ठहराते हुए सभी अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि डिक्री धारक को कब्ज़ा देने में जो भी बाधाएं थीं, वे कानूनन टिकाऊ नहीं हैं।
इसके साथ ही, वर्षों पुराने इस विवाद में अदालत ने यह संदेश भी दिया कि मुकदमे के दौरान की गई लेन-देन से न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर नहीं किया जा सकता।
Case Title:- Alka Shrirang Chavan & Anr. vs Hemchandra Rajaram Bhonsale & Ors.
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