दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी मामले में पेश किए गए दस्तावेज़ों का “स्रोत” बताने के लिए वकीलों को व्यक्तिगत हलफनामा देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा आदेश वकील–मुवक्किल गोपनीयता के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।
यह फैसला McDonald's India Pvt. Ltd. की याचिका पर आया, जिसमें निचली अदालत के एक आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक आपराधिक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें शिकायतकर्ता दीपक खोसला ने मैकडोनल्ड्स इंडिया और अन्य पर धोखाधड़ी व जालसाज़ी सहित कई गंभीर आरोप लगाए थे।
जांच के दौरान ट्रायल कोर्ट ने कंपनी के परिसरों में तलाशी और ज़ब्ती के आदेश दिए।
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इस आदेश को चुनौती देते हुए मैकडोनल्ड्स इंडिया ने रिवीजन याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान कंपनी ने वर्ष 2011 में दाखिल कुछ पुराने आवेदन अदालत के रिकॉर्ड पर रखे, यह दिखाने के लिए कि अचानक तलाशी की कोई तात्कालिक ज़रूरत नहीं थी।
विवाद कैसे खड़ा हुआ
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि ये पुराने दस्तावेज़ ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं थे और उन्हें “गुपचुप तरीके” से हासिल कर अदालत में पेश किया गया।
इसके बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) ने कंपनी के वकीलों को निर्देश दिया कि वे व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताएं कि दस्तावेज़ कहां से और कैसे मिले।
इसी आदेश को मैकडोनल्ड्स इंडिया ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने की।
अदालत ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 126 वकील–मुवक्किल के बीच हुई बातचीत और दस्तावेज़ों को गोपनीयता का संरक्षण देती है।
पीठ ने साफ शब्दों में कहा:
“जब कोई मुवक्किल अपने बचाव के लिए दस्तावेज़ वकील को सौंपता है, तो उस दस्तावेज़ का स्रोत बताना भी पेशेवर गोपनीयता के दायरे में आता है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक प्रथम दृष्टया यह साबित न हो कि दस्तावेज़ किसी अपराध या धोखाधड़ी के लिए इस्तेमाल किए गए हैं, तब तक इस गोपनीयता को तोड़ा नहीं जा सकता।
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धोखाधड़ी के अपवाद पर कोर्ट का रुख
शिकायतकर्ता ने दलील दी कि यदि दस्तावेज़ अवैध तरीके से हासिल किए गए हों, तो गोपनीयता लागू नहीं होती। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आरोप लगाना काफी नहीं है। धोखाधड़ी के अपवाद को लागू करने के लिए ठोस और प्रारंभिक सबूत होना ज़रूरी है।
अदालत ने नोट किया कि कंपनी ने पहले ही यह स्पष्टीकरण दे दिया था कि ये दस्तावेज़ उसे 2013 में कंपनी लॉ बोर्ड की कार्यवाही के दौरान मिले थे।
अदालत का अंतिम फैसला
सभी दलीलों पर विचार करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें वकीलों से दस्तावेज़ों का स्रोत बताने के लिए हलफनामा मांगा गया था।
इसके साथ ही वकीलों के खिलाफ जारी नोटिस और अन्य सभी संबंधित कार्यवाहियां भी खत्म कर दी गईं।
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए साफ किया कि वकीलों को ऐसी जानकारी देने के लिए बाध्य करना कानूनन गलत है और इससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होती है।
Case Title:- McDonald's India Pvt. Ltd. vs State (NCT of Delhi) & Anr.










