दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार, 9 जनवरी, 2026 को 27 वर्षीय महिला अधिवक्ता के साथ बलात्कार के आरोपी एक वरिष्ठ वकील को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा देने से इनकार कर दिया। यह निर्णय तब आया जब दोनों पक्षों ने अदालत को बताया कि विवाद सुलझ गया है, जिसके बाद पीठ ने मामले की कार्यवाही के तरीके पर तीखी टिप्पणी की।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक महिला अधिवक्ता की शिकायत से जुड़ा है, जिसमें उसने 51 वर्षीय वकील पर बलात्कार, मारपीट और आपराधिक धमकी देने के आरोप लगाए थे। इस शिकायत के आधार पर जून 2025 में दिल्ली के नेब सराय थाने में एफआईआर(FIR) दर्ज की गई थी।
शिकायत के अनुसार, आरोपी वकील ने शादी का झांसा देकर करीब पांच वर्षों तक कई बार उसके साथ जबरन संबंध बनाए। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि वह इस वर्ष गर्भवती हो गई थी और आरोपी उसे गर्भपात के लिए अस्पताल ले गया। बाद में दक्षिण दिल्ली के एक कंट्री क्लब में उसके साथ मारपीट की गई, जिसका कुछ हिस्सा सीसीटीवी कैमरों में कैद होने की बात कही गई है।
न्यायिक अधिकारियों से जुड़े आरोप
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब आरोप लगे कि दो न्यायिक अधिकारियों ने शिकायतकर्ता पर केस वापस लेने का दबाव बनाया। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रशासनिक स्तर पर न्यायिक अधिकारी संजीव कुमार सिंह को निलंबित कर दिया और एक अन्य जिला जज के खिलाफ भी अनुशासनात्मक जांच शुरू की।
अदालत के समक्ष याचिकाएं
आरोपी वकील ने हाईकोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं एक अग्रिम जमानत के लिए और दूसरी एफआईआर रद्द करने के लिए। सुनवाई के दौरान आरोपी और शिकायतकर्ता, दोनों पक्षों की ओर से कहा गया कि अब उनके बीच समझौता हो चुका है और सभी आरोप वापस ले लिए गए हैं।
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आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिमन्यु भंडारी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने किसी भी न्यायिक अधिकारी से संपर्क नहीं किया और यह मामला दोनों के बीच निजी विवाद का नतीजा है। उन्होंने कहा, “जांच अधिकारी को मेरे मुवक्किल की हिरासत की कोई जरूरत नहीं है।”
कोर्ट की टिप्पणी
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने पूरे घटनाक्रम पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पहले एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए गए, फिर न्यायिक अधिकारियों को मामले में घसीटा गया और अंत में समझौते की बात कही जा रही है।
न्यायाधीश ने खुली अदालत में टिप्पणी की,
“हमें नहीं पता कि यह मामला कितनी गहराई तक गया है और सच्चाई क्या है। हर चरण के साथ यह और ज्यादा संदिग्ध होता जा रहा है। मैंने न्यायाधीशों से जुड़े कुछ वीडियो रिकॉर्डिंग भी देखे हैं।”
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अदालत ने समझौते की स्वेच्छा पर भी सवाल उठाया।
“वकील धमकाते हैं, जज धमकाते हैं और फिर कहा जाता है कि समझौता सहमति से हुआ है,” न्यायमूर्ति भंभानी ने कहा।
कोर्ट का फैसला
सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी वकील को गिरफ्तारी से कोई भी अंतरिम संरक्षण देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे हालात में समझौता आरोपी को राहत देने का आधार नहीं बन सकता।
हालांकि, पीठ ने यह भी जोड़ा कि इस आदेश से आरोपी के अन्य कानूनी अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।
“इस आदेश में कही गई कोई भी बात याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपायों, जैसे नियमित जमानत के लिए आवेदन करने से नहीं रोकेगी,” अदालत ने कहा।
कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई फरवरी में तय कर दी।









