नई दिल्ली में सोमवार, 12 जनवरी को Supreme Court of India में पश्चिम बंगाल की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई। अदालत के समक्ष मतदाता सूची संशोधन के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए।
मामला क्या है
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Kapil Sibal ने दलील दी कि पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान नियमों का ठीक से पालन नहीं किया गया। उनका कहना था कि प्रक्रिया में कई असामान्य और अव्यवहारिक तरीके अपनाए गए, जिससे आम मतदाताओं में भ्रम और आशंका फैली।
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सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष कहा कि कई मामलों में आधिकारिक सूचनाएं व्हाट्सएप जैसे माध्यमों से भेजी गईं, जो एक संवैधानिक प्रक्रिया के लिए “अजीब” है।
अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सिब्बल ने कहा,
“SIR के क्रियान्वयन में कई असंगतियां दिखती हैं, जो तर्कसंगत नहीं लगतीं।”
उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इन प्रक्रियागत खामियों को गंभीरता से देखा जाए, क्योंकि इसका सीधा असर मतदाताओं के अधिकारों पर पड़ता है।
वहीं Election Commission of India की ओर से पेश वकील ने याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। पीठ ने आयोग को निर्देश दिया कि सभी याचिकाओं पर एक एकीकृत जवाब दाखिल किया जाए और संकेत दिया कि मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह की जाएगी।
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अदालत को यह भी बताया गया कि दिसंबर में आयोग पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि SIR के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोप “बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए” और राजनीतिक हितों से प्रेरित हैं।
पहले का हलफनामा
एक जनहित याचिका पर दिए गए हलफनामे में आयोग ने 24 जून और 27 अक्टूबर के SIR आदेशों को संवैधानिक और लंबे समय से चली आ रही प्रक्रिया बताया। आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है।
आयोग ने यह भी बताया कि 1950 के दशक से ही विशेष गहन पुनरीक्षण भारत की चुनावी व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। 1962-66, 1983-87, 1992-93, 2002 और 2004 में भी ऐसे अभ्यास हो चुके हैं।
आयोग के अनुसार, किसी भी मतदाता का नाम उचित प्रक्रिया के बिना नहीं हटाया जा सकता। पश्चिम बंगाल में 99.77 प्रतिशत मतदाताओं को पहले से भरे गए गणना फॉर्म दिए गए हैं, जिनमें से 70.14 प्रतिशत वापस प्राप्त हो चुके हैं।
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आयोग ने कहा कि बूथ लेवल अधिकारी कई बार घरों का दौरा करते हैं, बंद घरों पर नोटिस छोड़ते हैं और दस्तावेज़ एकत्र नहीं करते। बुजुर्गों, दिव्यांगों और असहाय मतदाताओं की मदद के लिए विशेष निर्देश भी दिए गए हैं।
अदालत का आदेश
सभी पक्षों को सुनने के बाद पीठ ने चुनाव आयोग को सभी याचिकाओं पर एकीकृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और स्पष्ट किया कि मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी।
Case Title: Mostari Bani v. The Election Commission of India & Connected Matters
Decision Date: 12 January 2026










