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मेडिकल बिलों की अनदेखी पड़ी भारी: गुजरात हाईकोर्ट ने सड़क हादसा मामले में मुआवज़ा बढ़ाया

Legal Heirs of Deceased Nileshbhai Mahendrabhai Vasant vs. Jigar Babubhai Shah & Another - गुजरात उच्च न्यायालय ने चिकित्सा बिलों और वैवाहिक स्थिति के आकलन में त्रुटियों को सुधारते हुए मोटर दुर्घटना मुआवजे को बढ़ाकर ₹45.57 लाख कर दिया।

Shivam Y.
मेडिकल बिलों की अनदेखी पड़ी भारी: गुजरात हाईकोर्ट ने सड़क हादसा मामले में मुआवज़ा बढ़ाया

सड़क दुर्घटना पीड़ित परिवारों के लिए मुआवज़ा सिर्फ एक रकम नहीं, बल्कि न्याय की अंतिम उम्मीद होता है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए गुजरात उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में मोटर दुर्घटना दावा मामले में दिए गए मुआवज़े को बढ़ा दिया। अदालत ने कहा कि इलाज से जुड़े प्रमाणित खर्चों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2011 की एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। निलेशभाई महेंद्रभाई वसंत अपने मित्र के साथ कार से बालोतरा जा रहे थे। सिद्धपुर–पालनपुर हाईवे पर अचानक एक एसटी बस सर्विस रोड से मुख्य सड़क पर आ गई। कार चालक ने अचानक ब्रेक लगाया, नियंत्रण खो बैठा और कार पलट गई।

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दुर्घटना में निलेशभाई को सिर सहित शरीर के कई हिस्सों में गंभीर चोटें आईं। उन्हें पहले सरकारी अस्पताल और बाद में अहमदाबाद के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। करीब 64 दिन अस्पताल में इलाज चला, लेकिन लंबे इलाज के बाद भी फरवरी 2012 में उनकी मृत्यु हो गई।

मृतक के कानूनी वारिसों ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवज़े की मांग करते हुए दावा याचिका दायर की थी। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने मई 2021 में आंशिक रूप से याचिका स्वीकार करते हुए लगभग 41 लाख रुपये का मुआवज़ा तय किया था।

अपील और मुख्य आपत्तियाँ

परिवार ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर कहा कि अधिकरण ने कई महत्वपूर्ण मेडिकल बिलों और देखभाल से जुड़े खर्चों को नहीं जोड़ा।

अपीलकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि इलाज के दौरान बाद की तारीखों के मेडिकल बिल, परिचारक और परिवहन खर्च के दस्तावेज रिकॉर्ड पर थे, लेकिन उन्हें गणना में शामिल नहीं किया गया। साथ ही, चार आश्रितों के बावजूद ‘लॉस ऑफ कंसोर्टियम’ की राशि बहुत कम तय की गई।

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अदालत की टिप्पणियाँ

न्यायालय ने रिकॉर्ड का बारीकी से अवलोकन किया। पीठ Justice Hasmukh D. Suthar ने माना कि कुछ मेडिकल बिल डिस्चार्ज के बाद के थे, जिन्हें अनदेखा करना सही नहीं था।

अदालत ने टिप्पणी की, “प्रमाणित इलाज खर्चों को नज़रअंदाज़ कर मुआवज़े का सही आकलन नहीं किया जा सकता।”

हालांकि, परिचारक और परिवहन खर्च से जुड़े कुछ बिलों में दोहराव पाए जाने पर अदालत ने उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, लेकिन न्यायसंगत समाधान के रूप में एकमुश्त राशि मंज़ूर की। कंसोर्टियम के मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक आश्रित को अलग-अलग यह लाभ मिलना चाहिए।

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निर्णय

हाईकोर्ट ने अधिकरण के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए कुल मुआवज़े की राशि बढ़ाकर 45,57,739 रुपये कर दी। इसमें अतिरिक्त मेडिकल खर्च, परिचारक व परिवहन के लिए एकमुश्त राशि और कंसोर्टियम की बढ़ी हुई रकम शामिल है। अदालत ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर बढ़ी हुई राशि 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित जमा करे।

इस तरह, अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि मुआवज़ा कोई “इनाम” नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार के वास्तविक नुकसान की भरपाई है, और प्रमाणित खर्चों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

Case Title:- Legal Heirs of Deceased Nileshbhai Mahendrabhai Vasant vs. Jigar Babubhai Shah & Another

Case Number:- First Appeal No. 1743 of 2022

Date of Judgment:- 08 January 2026

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