निजी रिश्तों में भरोसा सबसे अहम होता है। इसी भरोसे के टूटने पर झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने माना कि पत्नी की निजी तस्वीरों का इस्तेमाल कर उसे डराना, परिवार के सामने अपमानित करना और मानसिक दबाव बनाना “मानसिक क्रूरता” है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को तलाक देने से इनकार किया गया था।
विवाह और विवाद की शुरुआत
अपीलकर्ता महिला की शादी मार्च 2020 में हुई थी। शादी के कुछ ही दिनों बाद पति ने पत्नी का मोबाइल फोन चेक किया। आरोप है कि उसने पत्नी की निजी तस्वीरें बिना अनुमति अपने फोन में ट्रांसफर कर लीं। इसके बाद पति का व्यवहार बदल गया। पत्नी का कहना था कि इन तस्वीरों के सहारे उसे धमकाया गया, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और यहां तक कि पति ने ये तस्वीरें अपने परिवार के सदस्यों को भी दिखाईं। इससे उसका सामाजिक और पारिवारिक अपमान हुआ।
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महिला ने आरोप लगाया कि पैसों की मांग भी की गई और विरोध करने पर उसे घर से निकाल दिया गया। इसके बाद वह मायके में रहने लगी और फैमिली कोर्ट में क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दाखिल की।
फैमिली कोर्ट का फैसला
फैमिली कोर्ट ने सबूतों की कमी का हवाला देते हुए महिला की तलाक याचिका खारिज कर दी। कोर्ट की राय थी कि पत्नी अपने आरोपों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सकी। इसी आदेश के खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट में अपील की।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड और गवाहियों का दोबारा मूल्यांकन किया। अदालत ने साफ कहा कि मानसिक क्रूरता सिर्फ शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं होती।
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पीठ ने कहा,
“पति द्वारा पत्नी की निजी तस्वीरों को परिवार के सामने उजागर करना उसके सम्मान और गरिमा पर सीधा हमला है।”
कोर्ट ने यह भी माना कि पत्नी के चरित्र पर सवाल उठाना और निजी बातों को सार्वजनिक करना रिश्ते की बुनियाद को हिला देता है। ऐसे हालात में पति-पत्नी के साथ रहने की उम्मीद करना अव्यावहारिक है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- मानसिक क्रूरता भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक पीड़ा भी हो सकती है।
- बार-बार अपमान, धमकी और ब्लैकमेल करना क्रूरता की श्रेणी में आता है।
- पति-पत्नी का रिश्ता भरोसे पर टिका होता है, और भरोसा टूटने के बाद विवाह को जबरन निभाना उचित नहीं।
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हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने इन पहलुओं को सही तरीके से नहीं देखा, जिससे उसका फैसला “गलत आकलन” पर आधारित था।
अदालत का अंतिम फैसला
अपील स्वीकार करते हुए, उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) के तहत मानसिक क्रूरता के आधार पर पत्नी के पक्ष में तलाक की डिग्री प्रदान की।
सभी लंबित आवेदनों का भी निपटारा कर दिया गया।
Case Title: Debleena Dutta v. Suman Kumar Ruj
Case Number: First Appeal No. 327 of 2023
Date of Judgment: 7 January 2026
Judges:
- Justice Sujit Narayan Prasad
- Justice Arun Kumar Rai
Counsel:
For Appellant: Mr. Sanjay Prasad, Advocate
For Respondent:
- Mr. Abhijeet Kr. Singh, Advocate
- Mr. Shashank Kumar, Advocate
- Mr. Harsh Chandra, Advocate










