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दिल्ली दंगों से जुड़े UAPA मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, लंबी हिरासत के बावजूद जमानत से इनकार

गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी सरकार) और संबंधित अपीलें - सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं, कहा कि केवल देरी धारा 43डी (5) के तहत यूएपीए के प्रतिबंध को रद्द नहीं कर सकती।

Shivam Y.
दिल्ली दंगों से जुड़े UAPA मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, लंबी हिरासत के बावजूद जमानत से इनकार

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारी द्वारा सुनाए गए फैसले में दिल्ली दंगों की साजिश के हाई-प्रोफाइल मामले में कार्यकर्ता गुलफिशा फातिमा समेत कई आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि केवल लंबी कैद से गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत वैधानिक रोक को खत्म नहीं किया जा सकता। यह फैसला दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली कई अपीलों पर आया है, जिसमें जमानत याचिका खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा गया था।

यह मामला दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा दर्ज एफआईआर संख्या 59/2020 से जुड़ा है, जो फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के बाद दर्ज की गई थी। इन दंगों में 54 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों मकान, दुकानें व सार्वजनिक संपत्तियां क्षतिग्रस्त हुई थीं।

शुरुआत में मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं में दर्ज हुआ था, लेकिन बाद में जांच के दौरान इसमें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम – UAPA की गंभीर धाराएं भी जोड़ी गईं। पुलिस का दावा है कि यह हिंसा अचानक नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे एक सुनियोजित साजिश थी।

इस मामले में कुल सात आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिनमें गुलफिशा फातिमा, शरजील इमाम, उमर खालिद, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान, मीरान हैदर और शादाब अहमद शामिल हैं। सभी आरोपी 2020 से हिरासत में हैं और उन्होंने दलील दी कि मुकदमे में देरी उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

आरोपियों की ओर से मुख्य तर्क यह था कि वे चार से पांच साल से जेल में हैं, जबकि अब तक ट्रायल ठीक से शुरू भी नहीं हो पाया है। इस आधार पर संविधान के अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का हवाला देते हुए जमानत मांगी गई।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा,

“लंबी हिरासत अपने आप में जमानत का स्वचालित आधार नहीं हो सकती, खासकर तब जब मामला UAPA जैसे विशेष कानून के अंतर्गत हो।”

अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं होता कि देरी केवल अभियोजन पक्ष की वजह से हुई हो। कई बार प्रक्रिया संबंधी आपत्तियों और अर्जियों के कारण भी कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पाई।

UAPA में जमानत का कड़ा नियम

कोर्ट ने दो टूक कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत तभी दी जा सकती है, जब अदालत को यह लगे कि आरोप प्रथम दृष्टया सही नहीं हैं। इस चरण पर अदालत सबूतों का मूल्यांकन या बचाव पक्ष की दलीलों की गहराई से जांच नहीं करती।

पीठ ने टिप्पणी की,

“जमानत की सुनवाई को मिनी ट्रायल नहीं बनाया जा सकता।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सभी आरोपियों को एक ही तराजू में तौलना सही नहीं होगा। अभियोजन की कहानी के अनुसार, कुछ आरोपी कथित रूप से साजिश की योजना और दिशा तय करने में शामिल थे, जबकि कुछ की भूमिका स्थानीय स्तर पर सीमित बताई गई है।

अदालत ने कहा कि जमानत पर फैसला करते समय आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका और उस पर लगे आरोपों की प्रकृति बेहद अहम होती है।

आरोपियों की ओर से यह भी कहा गया कि मामला अधिकतम सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने का है, न कि आतंकवाद का। इस पर कोर्ट ने UAPA की धारा 15 का हवाला देते हुए कहा कि आतंकी कृत्य केवल हथियारों या बम तक सीमित नहीं है।

यदि कोई कृत्य देश की एकता, सुरक्षा या सामान्य नागरिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, तो वह कानून के दायरे में आ सकता है।

अदालत का अंतिम फैसला

सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि मौजूदा स्तर पर आरोपियों को जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया और सभी अपीलें खारिज कर दीं।

हालांकि, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह निर्देश भी दिया कि मामले की सुनवाई में अनावश्यक देरी न हो और कार्यवाही को प्राथमिकता दी जाए।

Case Title:- Gulfisha Fatima vs State (Govt. of NCT of Delhi) & Connected Appeals

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