कोलकाता हाईकोर्ट ने एक महिला की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य और “लास्ट सीन थ्योरी” के आधार पर आरोपी की भूमिका स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है।
यह फैसला न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति राय चट्टोपाध्याय की पीठ ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के जयगांव इलाके का है। 3 नवंबर 2010 को पुलिस को शिकायत मिली कि एक महिला का शव जर्ना बस्ती स्थित किराए के कमरे में मिला है। शिकायत महिला के बेटे ने दर्ज कराई थी।
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जांच में सामने आया कि आरोपी महिला को लगभग तीन महीने पहले अपने साथ ले गया था और दोनों एक किराए के कमरे में रह रहे थे। घटना से एक दिन पहले ही वे उस कमरे में रहने आए थे।
जब स्थानीय लोगों और पुलिस ने कमरे का दरवाजा तोड़ा, तो महिला का शव बिस्तर पर पड़ा मिला। उसके नाक और मुंह से खून निकल रहा था और शरीर पर कई चोट के निशान भी थे। बाद में पोस्टमॉर्टम के लिए शव को नॉर्थ बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेजा गया।
ट्रायल के दौरान कई गवाहों ने बयान दिया कि आरोपी और महिला को आखिरी बार उसी कमरे में साथ देखा गया था। मकान मालिक और अन्य स्थानीय लोगों ने भी पुष्टि की कि दोनों 1 नवंबर 2010 को किराएदार के रूप में वहां रहने आए थे।
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अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने घटना के बाद अलग-अलग लोगों को अलग-अलग जानकारी दी। उसने महिला के बेटे को फोन कर कहा कि उसकी मां गंभीर रूप से बीमार है, जबकि अपने सहकर्मी को बताया कि महिला की दुर्घटना में मौत हो गई।
अदालत ने इसे आरोपी के “घबराए हुए व्यवहार” का संकेत माना। पीठ ने कहा,
“घटना के तुरंत बाद आरोपी द्वारा दी गई विरोधाभासी जानकारी उसके अपराध के बाद की मानसिक स्थिति को दर्शाती है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला पूरी तरह आरोपी के साथ रह रही थी और उसकी गतिविधियों पर आरोपी का नियंत्रण था। ऐसे में यह आरोपी की जिम्मेदारी थी कि वह बताए कि महिला की मौत कैसे हुई।
पीठ ने कहा कि जब कोई व्यक्ति आखिरी बार पीड़ित के साथ देखा जाता है और उसके बाद पीड़ित मृत पाया जाता है, तो आरोपी पर घटनाक्रम स्पष्ट करने का दायित्व होता है।
अदालत ने यह भी पाया कि हत्या के बाद आरोपी अचानक गायब हो गया और दो दिनों तक अपने कार्यस्थल पर भी नहीं गया।
पीठ ने कहा,
“परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला यह स्पष्ट करती है कि पीड़िता की मृत्यु में आरोपी की ही भूमिका थी और कोई अन्य संभावित निष्कर्ष नहीं निकलता।”
सभी साक्ष्यों और गवाहियों का विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था। अदालत ने कहा कि अभियोजन ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की मजबूत श्रृंखला स्थापित की है और आरोपी के खिलाफ आरोप साबित होते हैं।
इस आधार पर अदालत ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। साथ ही अदालत ने आरोपी को दस दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया और उसके जमानत बांड रद्द कर दिए।
Case Title:- Md. Abdul Mottalab Mia @ Abdul Mottalab vs The State of West Bengal
Case Number:- CRA 614 of 2014
Judgment Date:- 12 March 2026










