सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2007 के राजस्थान टैक्सी चालक अपहरण और हत्या मामले में चार आरोपियों को दी गई बरी को बरकरार रखते हुए कहा है कि केवल मजबूत शक के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी साबित करने में असफल रहा।
न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने राजस्थान सरकार और शिकायतकर्ता पवन कुमार शर्मा की अपीलों को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला 28 अप्रैल 2007 को दर्ज एक शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता पवन कुमार शर्मा ने पुलिस को बताया था कि उनके भाई अशोक कुमार शर्मा अपनी बोलेरो जीप को टैक्सी के रूप में चलाते थे। 26 अप्रैल 2007 को दो युवक उनकी गाड़ी किराये पर लेकर गए थे, लेकिन अशोक उसी रात वापस नहीं लौटे।
जांच के दौरान पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया और बाद में अशोक का शव एक सूखे कुएं से बरामद किया गया। ट्रायल कोर्ट ने चार आरोपियों को अपहरण, हत्या, डकैती और साक्ष्य मिटाने के अपराध में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हालांकि, बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने सबूतों को अपर्याप्त मानते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और ऐसे मामलों में अभियोजन को हर परिस्थिति स्पष्ट और मजबूत तरीके से साबित करनी होती है।
अदालत ने शव बरामदगी पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि पुलिस रिकॉर्ड में हत्या की धाराएं पहले ही जोड़ दी गई थीं, जबकि उस समय तक शव बरामद नहीं हुआ था। इसके अलावा, स्वतंत्र गवाहों के बयान भी अभियोजन की कहानी से मेल नहीं खाते थे।
पीठ ने कहा,
“अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा कि शव की बरामदगी वास्तव में आरोपी के खुलासे के आधार पर हुई थी।”
अदालत ने “लास्ट सीन” यानी मृतक को आखिरी बार आरोपियों के साथ देखे जाने वाले साक्ष्य को भी कमजोर माना। कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती जब तक कोई मजबूत सहायक साक्ष्य मौजूद न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
“संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह कानूनी साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि बरामद किए गए सामान जैसे टेप रिकॉर्डर, घड़ी और तौलिये की पहचान प्रक्रिया ठीक तरीके से नहीं कराई गई थी, जिससे अभियोजन का मामला और कमजोर हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला “संभव और न्यायसंगत दृष्टिकोण” पर आधारित था और उसमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं बनता। इसके साथ ही अदालत ने सभी अपीलें खारिज कर दीं और चारों आरोपियों की बरी बरकरार रखी।
Case Details:
Case Title: Pawan Kumar Sharma v. Manoj Kumar & Ors.
Case Number: Criminal Appeal Nos. 1353-1355 of 2017 along with Criminal Appeal Nos. 1356-1358 of 2017
Judges: Justice Pankaj Mithal and Justice Prasanna B. Varale
Decision Date: May 25, 2026











