कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपी को दी गई जमानत रद्द कर दी है। अदालत ने साफ कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मामले की गंभीरता और पीड़िता के बयान को नजरअंदाज कर जमानत दी, जो कानून के अनुरूप नहीं था।
यह आदेश न्यायमूर्ति बिवास पटनायक की एकल पीठ ने पारित किया। मामला जमानत रद्द करने की याचिका से जुड़ा था।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला पश्चिम बंगाल के एगरा थाने में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। पीड़िता की मां ने शिकायत में आरोप लगाया कि उनकी 14 वर्षीय बेटी के साथ उसके अंग्रेज़ी ट्यूटर ने यौन शोषण किया।
एफआईआर भारतीय दंड संहिता की धारा 376(3) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दर्ज हुई। आरोपी ने पहले अग्रिम जमानत की कोशिश की, जिसे खारिज कर दिया गया। बाद में उसने आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत मांगी।
10 जुलाई 2024 को ट्रायल कोर्ट ने जमानत याचिका ठुकरा दी थी। लेकिन 20 जुलाई 2024 को, चार्जशीट दाखिल होने के बाद, उसी अदालत ने आरोपी को जमानत दे दी।
पीड़िता की ओर से इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जमानत रद्द करने की अर्जी दाखिल की गई।
हाईकोर्ट ने सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करने की याचिका सुनवाई योग्य है। अदालत ने कहा कि अगर जमानत आदेश “गंभीर त्रुटि” या “गैर-प्रासंगिक आधार” पर दिया गया हो, तो उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
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न्यायालय ने पीड़िता के धारा 164 सीआरपीसी के तहत दिए गए बयान का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि पीड़िता ने स्पष्ट रूप से आरोपी पर बार-बार यौन उत्पीड़न और अश्लील तस्वीरें खींचकर ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया है।
पीठ ने कहा,
“ट्रायल कोर्ट ने मात्र इस आधार पर जमानत दी कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। यह अपने आप में जमानत देने का पर्याप्त कारण नहीं हो सकता।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि 10 जुलाई को जब जमानत खारिज की गई थी, तब अदालत ने मामले में पर्याप्त प्रथम दृष्टया साक्ष्य पाए थे। केवल दस दिन बाद, बिना किसी नई परिस्थिति के, जमानत देना न्यायसंगत नहीं था।
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न्यायालय ने कहा,
“जमानत आदेश में आरोपों की गंभीरता, संभावित सजा और समाज पर प्रभाव जैसे पहलुओं पर कोई ठोस चर्चा नहीं की गई। यह आदेश गैर-आवेदन-मन (non-application of mind) को दर्शाता है।”
अदालत ने यह भी कहा कि पॉक्सो अधिनियम एक विशेष कानून है, जिसका उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों के खिलाफ अपराध को “निजी मामला” नहीं माना जा सकता, बल्कि यह समाज के खिलाफ अपराध है।
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हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 29 के तहत जो अनुमान (presumption) है, वह ट्रायल के दौरान लागू होता है, न कि केवल एफआईआर दर्ज होते ही।
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि 20 जुलाई 2024 का जमानत आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
अदालत ने आदेश दिया कि आरोपी की जमानत तत्काल प्रभाव से रद्द की जाती है।
साथ ही निर्देश दिया गया कि आरोपी 10 दिनों के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करे। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो ट्रायल कोर्ट को उसे हिरासत में लेने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे।
इसी के साथ जमानत रद्द करने की याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
Case Title:- XXXX vs. The State of West Bengal & Anr.
Case Number:- C.R.M. (M) 1069 of 2025
Date of Judgment:- 02.03.2026









