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ओबीसी प्रमाणपत्र विवाद: कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रधान का सर्टिफिकेट रद्द करने का दिया आदेश

रणजीत रक्षित बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (खुकुरानी मोंडल घोराई बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य के साथ), कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस्वरपुर ग्राम पंचायत प्रधान का ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द करने का आदेश दिया, एसडीओ की जांच को सही ठहराया।

Vivek G.
ओबीसी प्रमाणपत्र विवाद: कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रधान का सर्टिफिकेट रद्द करने का दिया आदेश

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के एक ग्राम पंचायत प्रधान से जुड़े ओबीसी प्रमाणपत्र विवाद में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि जब जांच में यह साबित हो गया कि संबंधित व्यक्ति ओबीसी वर्ग से नहीं है, तो प्रमाणपत्र रद्द करना अनिवार्य है।

न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एकल पीठ ने यह आदेश 25 फरवरी 2026 को पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद इस्वरपुर ग्राम पंचायत, चांदीपुर ब्लॉक से जुड़ा है। वर्ष 2023 के पंचायत चुनाव में प्रधान का पद ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित था।

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याचिकाकर्ता रंजीत रक्षित ने आरोप लगाया कि निर्वाचित प्रधान खुकुरानी मंडल घोराई ने ओबीसी (तांती/तंतुबाया उपजाति) का प्रमाणपत्र गलत तरीके से हासिल किया और उसी के आधार पर चुनाव लड़ा।

रंजीत रक्षित ने पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 15 जनवरी 2025 को अदालत ने उप-विभागीय अधिकारी (एसडीओ), तमलुक को पुनः जांच का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि दोनों पक्षों को सुनकर कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए और यदि आरोप सही पाए जाएं तो आवश्यक कदम उठाए जाएं।

एसडीओ की जांच और रिपोर्ट

अदालत के आदेश के बाद एसडीओ ने ब्लॉक विकास अधिकारी, संयुक्त बीडीओ और निरीक्षक (पिछड़ा वर्ग कल्याण) की संयुक्त टीम से जांच कराई।

जांच रिपोर्ट में बताया गया कि संबंधित प्रमाणपत्र 2013 में जारी हुआ था और वह तकनीकी रूप से सही पाया गया। लेकिन जब सहायक दस्तावेज मांगे गए तो खुकुरानी मंडल घोराई कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकीं।

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मैदानी जांच में पाया गया कि उनके क्षेत्र में अधिकांश लोग महिष्य उपजाति से हैं। परिवार और स्थानीय लोगों के बयान में भी यही सामने आया कि उनके रीति-रिवाज, गोत्र (शांडिल्य) और सामाजिक पहचान महिष्य समुदाय से मेल खाते हैं।

रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि “उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर यह स्थापित नहीं होता कि संबंधित व्यक्ति ओबीसी (तांती/तंतुबाया) समुदाय से हैं।”

23 जुलाई 2025 को एसडीओ ने आदेश दिया कि वह ओबीसी समुदाय से संबंधित नहीं हैं।

अदालत में दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जब एसडीओ ने यह निष्कर्ष दे दिया कि प्रमाणपत्र गलत आधार पर है, तो उसे रद्द करना जरूरी था। उन्होंने कहा, “आरक्षित पद पर गैर-ओबीसी व्यक्ति का बने रहना संविधान की भावना के विपरीत है।”

दूसरी ओर, खुकुरानी मंडल घोराई की ओर से कहा गया कि प्रमाणपत्र 2013 में विधिवत जारी हुआ था। यह भी तर्क दिया गया कि कुछ दस्तावेज चक्रवात ‘आइला’ और अन्य कारणों से खो गए थे।

राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि जांच अदालत के निर्देशानुसार हुई और संबंधित पक्ष आवश्यक दस्तावेज पेश करने में असफल रहे।

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अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने अपने आदेश में कहा कि एसडीओ ने अदालत के निर्देशों के अनुरूप जांच कराई और दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया।

अदालत ने पाया कि निजी प्रतिवादी ने जांच समिति की रिपोर्ट को न तो चुनौती दी और न ही कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत किया।

पीठ ने स्पष्ट कहा कि जब यह निष्कर्ष निकल चुका है कि संबंधित व्यक्ति ओबीसी वर्ग से नहीं हैं, तो प्रमाणपत्र का बने रहना उचित नहीं है।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कानून के तहत यदि प्रमाणपत्र गलत सूचना या तथ्यों के दमन से प्राप्त किया गया हो, तो उसे रद्द किया जा सकता है।

फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि 23 जुलाई 2025 का एसडीओ का आदेश वैध है और उसमें कोई अवैधता नहीं पाई गई।

अदालत ने एसडीओ, तमलुक को निर्देश दिया कि एक सप्ताह के भीतर खुकुरानी मंडल घोराई का ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द करने की कार्रवाई पूरी की जाए।

इसके साथ ही रंजीत रक्षित की याचिका स्वीकार कर ली गई, जबकि खुकुरानी मंडल घोराई की याचिका खारिज कर दी गई।

Case Title: Ranajit Rakshit vs The State of West Bengal & Ors. (With Khukurani Mondal Ghorai vs State of West Bengal & Ors.)

Case No.: WPA 21813 of 2025 & WPA 20033 of 2025

Decision Date: 25 February 2026

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