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ओडिशा हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामले में भाभी के खिलाफ कार्यवाही की रद्द पति और ससुरालवालों पर चलेगा मुकदमा

ओडिशा हाईकोर्ट ने CRLMC याचिका को वी रूप से स्वीकारते हुए दहेज उत्पीड़न मामले में भाभी के खिलाफ कार्यवाही रद्द की लेकिन पति और उसके माता-पिता पर ट्रायल जारी रखने का आदेश दिया।

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ओडिशा हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामले में भाभी के खिलाफ कार्यवाही की रद्द  पति और ससुरालवालों पर चलेगा मुकदमा

ओडिशा हाईकोर्ट, कटक ने 6 अगस्त 2025 को दिए एक अहम फैसले में CRLMC संख्या 2444/2016 के तहत दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दहेज उत्पीड़न के एक मामले में सिर्फ भाभी (याचिकाकर्ता संख्या 4) के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी, जबकि पति और उसके माता-पिता (याचिकाकर्ता संख्या 1, 2 और 3) पर मुकदमा जारी रखने का निर्देश दिया।

यह मामला देबी प्रसाद बिंधानी बनाम ओडिशा राज्य एवं अन्य से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं ने 19 अगस्त 2015 को एस.डी.जे.एम., बालासोर द्वारा सी.टी. केस संख्या 2268/2014 में दिए गए संज्ञान आदेश को चुनौती दी थी, जो बालासोर टाउन पी.एस. केस संख्या 237/2014 के आधार पर दर्ज हुआ था।

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प्रकरण के अनुसार, याचिकाकर्ता संख्या 1 (पति) और विपक्षी पक्ष संख्या 2 (पत्नी) का विवाह 23 नवंबर 2008 को हुआ था। विवाह के बाद विभिन्न कारणों से दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगे। पत्नी ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर दहेज के लिए शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया, जिसमें ₹5 लाख की मांग, गर्भावस्था में खाना न देना, मारपीट और जान से मारने की कोशिश जैसे गंभीर आरोप शामिल थे।

पत्नी ने ICC केस संख्या 1184/2014 दर्ज कराया, जो बाद में पुलिस केस संख्या 237/2014 में परिवर्तित हो गया। पुलिस ने जांच कर आरोप पत्र दाखिल किया और कोर्ट ने संज्ञान लिया।

“विवाह के बाद मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना, प्रसव के बाद खाना न देना और ₹5 लाख की मांग जैसे आरोप प्रथम दृष्टया निराधार नहीं हैं।” — न्यायालय ने गवाहों और पुजारी के बयान के आधार पर यह टिप्पणी की।

हालांकि, याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से कहा गया कि सभी आरोप झूठे हैं और केवल प्रताड़ित करने के उद्देश्य से लगाए गए हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता संख्या 4 (भाभी) के खिलाफ कोई ठोस आरोप नहीं है और उसके विरुद्ध केवल सामान्य आरोप लगाए गए हैं।

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न्यायालय ने माना:

याचिकाकर्ता संख्या 4 के विरुद्ध कोई विशेष व ठोस आरोप नहीं है, अतः उसके खिलाफ कार्यवाही जारी रखना न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

परंतु, पति और उसके माता-पिता के खिलाफ लगे आरोपों को न्यायालय ने गंभीर मानते हुए कहा कि:

याचिकाकर्ता संख्या 1, 2 और 3 के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य हैं, जो ट्रायल की आवश्यकता को दर्शाते हैं। इन्हें इस स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति चित्तारंजन दाश की अध्यक्षता में यह फैसला सुनाया गया, जिसमें CRLMC को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए केवल याचिकाकर्ता संख्या 4 के विरुद्ध संज्ञान आदेश को रद्द किया गया, जबकि अन्य के विरुद्ध कार्यवाही जारी रखने का आदेश दिया गया।

मामले का शीर्षक : देबी प्रसाद बिंधानी एवं अन्य बनाम ओडिशा राज्य एवं अन्य

मामला संख्या : CRLMC संख्या 2444/2016

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