भूमि बिक्री समझौते से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस (Specific Performance) की डिक्री में तय समय के भीतर भुगतान न होने पर समझौता अपने आप समाप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि निचली अदालतों को केवल तकनीकी आधार पर डिक्री रद्द करने के बजाय पक्षकारों के व्यवहार, परिस्थितियों और न्यायसंगत पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद 2011 के एक भूमि बिक्री समझौते का था, जिसमें 3.75 एकड़ जमीन 16 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से बेचने का करार हुआ था। खरीदार की ओर से 2.5 लाख रुपये अग्रिम दिए गए थे।
ट्रायल कोर्ट ने 3 मार्च 2017 को खरीदार के पक्ष में डिक्री पारित करते हुए निर्देश दिया था कि वह एक महीने के भीतर शेष 57.5 लाख रुपये विक्रेता को दे या अदालत में जमा करे। इसके बाद विक्रेता को बिक्री विलेख (Sale Deed) निष्पादित करना था।
खरीदार ने दावा किया कि उसने विक्रेता को नोटिस भेजकर राशि लेने और रजिस्ट्री करने को कहा, लेकिन विक्रेता ने भुगतान स्वीकार नहीं किया। इसके बाद 2017 में निष्पादन कार्यवाही (Execution Proceedings) शुरू की गई।
हालांकि, राशि अदालत में वास्तविक रूप से नवंबर 2020 में जमा हुई। इस बीच विक्रेता की ओर से अपील भी दायर की गई थी।
एग्जीक्यूशन कोर्ट ने जुलाई 2023 में कहा कि चूंकि डिक्री में तय एक महीने की अवधि के भीतर राशि जमा नहीं की गई, इसलिए डिक्री लागू नहीं की जा सकती। अदालत ने निष्पादन आवेदन खारिज कर दिया और जमा राशि वापस लेने की अनुमति दी।
इसके खिलाफ दायर याचिका को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने विशेष रूप से विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 28 की व्याख्या की। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान अदालत को यह अधिकार देता है कि वह परिस्थितियों के अनुसार अनुबंध रद्द करे या भुगतान के लिए अतिरिक्त समय दे।
पीठ ने कहा,
“केवल तय समयसीमा के भीतर राशि जमा न होने से अपने आप डिक्री समाप्त नहीं हो जाती।”
पीठ ने कहा कि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस की डिक्री “प्रारंभिक डिक्री” की तरह होती है और बिक्री विलेख निष्पादित होने तक अदालत का नियंत्रण बना रहता है।
अदालत ने कहा कि निचली अदालतों ने यह नहीं देखा कि मूल डिक्री में समयसीमा का उल्लंघन होने पर स्वतः अनुबंध समाप्त होने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। ऐसे में केवल देरी के आधार पर डिक्री को निष्प्रभावी मानना उचित नहीं था।
पीठ ने यह भी कहा कि अदालतों को यह देखना चाहिए था कि खरीदार की ओर से भुगतान करने की इच्छा लगातार बनी हुई थी या नहीं और क्या विक्रेता को अतिरिक्त शर्तों या मुआवजे के माध्यम से संतुलित किया जा सकता था।
अदालत ने कहा,
“धारा 28 अदालत को विवेकाधीन शक्ति प्रदान करती है और इसका उपयोग न्यायसंगत तरीके से किया जाना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट और एग्जीक्यूशन कोर्ट दोनों के आदेश रद्द कर दिए। अदालत ने निष्पादन आवेदन और अनुबंध रद्द करने से जुड़ी सभी अर्जियों को फिर से सुनवाई के लिए बहाल कर दिया।
पीठ ने निर्देश दिया कि निचली अदालत मामले पर नए सिरे से विचार करे और यह तय करे कि देरी के बावजूद खरीदार को समय बढ़ाने का लाभ मिलना चाहिए या नहीं।
Case Details:
Case Title: Anand Narayan Shukla v. Jagat Dhari
Case Number: Civil Appeal No. 7355 of 2026 (@ SLP (C) No. 14206 of 2025)
Judges: Justice Manoj Misra and Justice Manmohan
Decision Date: May 8, 2026











