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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी बार काउंसिल के 14,000 नामांकन शुल्क पर जारी किया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी बार काउंसिल को नोटिस जारी किया है, जिसने अधिवक्ताओं से ₹14,000 शुल्क वसूला, जबकि 2024 के गौरव कुमार बनाम भारत संघ फैसले में अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24 के तहत शुल्क सीमा तय की गई थी।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी बार काउंसिल के 14,000 नामांकन शुल्क पर जारी किया नोटिस

25 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल (UPBC) प्रैक्टिस सर्टिफिकेट के नाम पर ₹14,000 वसूल रही है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह मांग सुप्रीम कोर्ट के गौरव कुमार बनाम भारत संघ (2024) फैसले का उल्लंघन है।

मामला क्या है?

गौरव कुमार केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राज्य बार काउंसिल अधिवक्ताओं के नामांकन शुल्क को अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24 में तय सीमा से अधिक नहीं ले सकतीं। अधिनियम के अनुसार:

  • सामान्य श्रेणी के अधिवक्ताओं से अधिकतम ₹750 शुल्क लिया जा सकता है।
  • अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के अधिवक्ताओं के लिए यह सीमा ₹125 है।

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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि नामांकन शुल्क के अलावा बार काउंसिल किसी भी प्रकार का अतिरिक्त या वैकल्पिक शुल्क नहीं वसूल सकती।

यह याचिका दीपक यादव, जो कि एक प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता हैं, ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया और यूपी बार काउंसिल के खिलाफ दायर की। उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि:

  • गौरव कुमार फैसले से पहले यूपी बार काउंसिल ₹16,500 वसूल रही थी।
  • कोर्ट के निर्देशों के बावजूद अब भी यूपीबीसी इसे केवल घटाकर ₹14,000 कर चुकी है और इसे प्रैक्टिस सर्टिफिकेट शुल्क का नाम दिया है।
  • इसके समर्थन में यूपीबीसी का एक आधिकारिक पत्र भी कोर्ट में पेश किया गया।

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मामला सबसे पहले जस्टिस जेबी पारडीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ के सामने आया। शुरुआत में बेंच ने सवाल उठाया कि जब कोर्ट पहले ही इस पर स्पष्ट निर्णय दे चुका है तो बार-बार ऐसी याचिकाएं क्यों दायर की जा रही हैं।

लेकिन, जब यूपी बार काउंसिल का आधिकारिक पत्र देखा गया तो कोर्ट ने इसे प्रथम दृष्टया उल्लंघन माना।

“इस रिट याचिका में उठाए गए मुद्दे को गौरव कुमार फैसले (30 जुलाई 2024) में पहले ही तय किया जा चुका है। हमारे समक्ष 20 जुलाई 2025 का एक पत्र प्रस्तुत किया गया है, जो प्रथम दृष्टया गौरव फैसले में दिए गए निर्देशों के विपरीत है। नोटिस जारी किया जाए।” – सुप्रीम कोर्ट

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हाल ही में जस्टिस जेबी पारडीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य बार काउंसिल्स नामांकन के समय किसी भी प्रकार का “वैकल्पिक शुल्क” नहीं वसूल सकतीं।

केस विवरण

  • केस का नाम: दीपक यादव बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया
  • केस नंबर: डब्ल्यूपी (सिविल) नं. 774/2025

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