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सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के खिलाफ झूठी अनुशासनात्मक शिकायतें की रद्द, बार काउंसिल पर ₹50,000 का जुर्माना

बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा बनाम राजीव नरेशचंद्र नरूला एवं अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के खिलाफ बार काउंसिल के कदाचार के तुच्छ मामलों को खारिज कर दिया, बीसीएमजी पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया, वकीलों को परेशान करने के खिलाफ चेतावनी दी।

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के खिलाफ झूठी अनुशासनात्मक शिकायतें की रद्द, बार काउंसिल पर ₹50,000 का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देशभर की बार काउंसिलों को कड़ा संदेश दिया कि बिना आधार वाली अनुशासनात्मक शिकायतों को हल्के में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। एक सख्त फैसले में, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने महाराष्ट्र और गोवा बार काउंसिल (BCMG) द्वारा शुरू की गई दो अनुशासनात्मक कार्यवाहियों को “फ्रिवोलस” और “क्रिप्टिक” करार देते हुए रद्द कर दिया।

पृष्ठभूमि

पहला मामला अधिवक्ता राजीव नरेशचंद्र नरूला से जुड़ा था, जिन्हें मुंबई की पुरानी संपत्ति विवादों से जुड़े आरोपों में अनुशासनात्मक कार्यवाही में घसीटा गया। शिकायतकर्ता, खिमजी देवजी परमार, ने आरोप लगाया कि नरूला ने अहम तथ्यों को छुपाया और 2005 में बॉम्बे हाईकोर्ट में सहमति डिक्री (कंसेंट टर्म्स) से लाभ उठाया।

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परमार, जिन्होंने अपने पिता की फर्म एम/एस वोल्गा एंटरप्राइजेज में हिस्सेदारी विरासत में पाई, का कहना था कि उनके परिवार को संपत्ति से जुड़े अधिकारों से वंचित कर दिया गया क्योंकि नरूला और अन्य ने हस्ताक्षर छुपाए और सहमति की शर्तों को अदालत में गलत ढंग से प्रस्तुत किया।

दूसरे मामले में अधिवक्ता गीता रमणुग्रह शास्त्री पर शिकायतकर्ता बंसीधर अन्नाजी भाकड़ ने झूठी गवाही (परजरी) का साथ देने का आरोप लगाया। भाकड़, जो पहले व्याख्याता थे और बाद में वकालत शुरू की, का कहना था कि शास्त्री मात्र एक शपथपत्र में दस्‍तखत पहचानने से उसकी सामग्री की जिम्मेदार हो गईं।

दोनों शिकायतें BCMG ने अनुशासन समिति (DC) को भेज दीं, जिसके खिलाफ अधिवक्ताओं ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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न्यायालय की टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य बार काउंसिल ने बिना दिमाग लगाए और बिना कारण दर्ज किए कार्यवाही की। फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति मेहता ने कहा:

“यह दर्ज करना कि अधिवक्ता ने कदाचार किया है, अनुशासन समिति को शिकायत भेजने से पहले अनिवार्य शर्त है।”

नरूला के मामले में कोर्ट ने पाया कि उन्होंने कभी भी शिकायतकर्ता या उनके पूर्वज का प्रतिनिधित्व नहीं किया। वे तो सिर्फ एम/एस यूनिक कंस्ट्रक्शन के प्रतिनिधि की पहचान कराने वाले थे, जो सहमति शर्तें आज भी मान्य हैं।

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पीठ ने स्पष्ट किया, "सिर्फ पहचान कराने से ही अधिवक्ता को धारा 35 के तहत कार्यवाही झेलने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।"

शास्त्री के मामले में कोर्ट ने माना कि केवल शपथपत्र में दस्‍तखत पहचान लेने से वकील उसकी सामग्री के लिए जिम्मेदार नहीं बनते। न्यायाधीशों ने आरोपों को 'पूरी तरह निराधार और असंगत' कहा।

पीठ बार काउंसिल की 'क्रिप्टिक' रेफरल आदेशों पर भी खासा नाराज़ हुई, क्योंकि उनमें शिकायतों का ज़िक्र तक नहीं था, फिर भी वकीलों की साख पर असर डाल सकते थे।

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निर्णय

दोनों विवादों पर विराम लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अनुशासनात्मक शिकायतों को पूरी तरह रद्द कर दिया। अदालत ने ₹50,000 का जुर्माना भी लगाया नरूला के मामले में बार काउंसिल पर और शास्त्री के मामले में बार काउंसिल व शिकायतकर्ता भाकड़ पर संयुक्त रूप से। यह राशि बॉम्बे हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा होगी और फिर दोनों अधिवक्ताओं को दी जाएगी।

फैसले को समाप्त करते हुए पीठ ने कहा कि अनुशासनात्मक तंत्र वकालत पेशे की गरिमा बचाने के लिए है, न कि विरोधी पक्ष की नाराज़गी पर वकीलों को परेशान करने के लिए।

"प्रतिद्वंद्वी वादकारियों द्वारा वकीलों का दुर्भावनापूर्ण अभियोजन किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता," अदालत ने ज़ोर देकर कहा।

इसके साथ ही, उच्चतम न्यायालय ने इन मामलों से जुड़े सभी लंबित आवेदन भी निपटा दिए।

केस का शीर्षक: बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा बनाम राजीव नरेशचंद्र नरूला और अन्य।

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