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सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड की 11 साल की देरी पर लगाई फटकार, ज़मीन मुआवज़ा आदेश बहाल

सुप्रीम कोर्ट ने 11 साल की देरी पर कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड को फटकार लगाई और शिवम्मा के वारिसों के लिए ज़मीन मुआवज़ा आदेश बहाल किया।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड की 11 साल की देरी पर लगाई फटकार, ज़मीन मुआवज़ा आदेश बहाल

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया जिसने कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड (KHB) की 11 साल की देरी को माफ़ कर दिया था। ज़मीन मुआवज़े के फैसले को चुनौती देने में इस लंबी देरी को लेकर जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट की नरमी “विवेकाधिकार का दुरुपयोग” है और शिवम्मा के परिवार को दिया गया मुआवज़ा बहाल किया।

पृष्ठभूमि

यह विवाद कलबुर्गी ज़िले की 9.13 एकड़ ज़मीन से जुड़ा है। 1989 में पारिवारिक बंटवारे के बाद शिवम्मा को यह ज़मीन विरासत में मिली। 1979 में KHB ने चार एकड़ ज़मीन पर हाउसिंग कॉलोनी बनाने के लिए कब्ज़ा कर लिया था। ट्रायल कोर्ट ने पहले तो उनका दावा खारिज किया, लेकिन 2006 में प्रथम अपीलीय अदालत ने शिवम्मा को मालिकाना हक़ देते हुए कहा कि पहले से बने मकानों को देखते हुए ज़मीन वापस नहीं दी जा सकती, पर मुआवज़ा ज़रूर दिया जाए। 2011 में निष्पादन कार्यवाही के दौरान नोटिस मिलने के बावजूद KHB ने अपनी दूसरी अपील 2017 में दायर की-यानी लगभग 3,966 दिन की देरी से।

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अदालत की टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 की विस्तार से व्याख्या की, जो “पर्याप्त कारण” साबित होने पर देरी माफ़ करने की अनुमति देती है। जस्टिस पारदीवाला ने कहा, “राज्य की सुस्ती और आराम के लिए कोई छूट नहीं दी जा सकती।” उन्होंने जोड़ा कि “within such period” (निर्धारित अवधि के भीतर) का मतलब है कि अपीलकर्ता को यह बताना होगा कि वह मूल समय सीमा और उसके बाद दोनों में क्यों कार्रवाई नहीं कर पाया।

पीठ ने पाया कि 2008 के बाद KHB की फाइलों में कोई हलचल नहीं थी। कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की, “अधिकारियों ने 2011 में निष्पादन नोटिस मिलने के बाद भी अपने कर्तव्य पर आंख मूंदे रखी। सार्वजनिक संस्थाएं नागरिकों के अधिकारों के मामले में नौकरशाही का बहाना नहीं बना सकतीं।”

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फैसला

अपील को मंज़ूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का 2017 का आदेश रद्द कर दिया जिसने देरी को माफ़ किया था। अदालत ने 2006 का वह डिक्री बहाल कर दी जिसमें KHB को कब्ज़ाई गई ज़मीन का मुआवज़ा देने का निर्देश था, जिससे शिवम्मा के कानूनी वारिसों को लंबे समय से लंबित राहत मिली। यह फ़ैसला केवल मुआवज़ा देने तक सीमित है, भुगतान की प्रक्रिया निचली अदालत पूरी करेगी।

मामला: शिवम्मा (मृत) बनाम कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड एवं अन्य

अपील संख्या: सिविल अपील संख्या 11794/2025 (विशेष अनुमति याचिका (सी) संख्या 10704/2019 से उत्पन्न)

निर्णय तिथि: 2025 (2025 आईएनएससी 1104 के रूप में रिपोर्ट किया गया)

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