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तेलंगाना उच्च न्यायालय ने एससी/एसटी अत्याचार मामले को खारिज कर दिया, वैवाहिक विवाद में आरोपों को सार्वजनिक अपमान नहीं माना जाएगा

तेलंगाना हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद में दर्ज एससी/एसटी एक्ट केस खारिज किया, कहा निजी अपमान सार्वजनिक दृष्टि की शर्त पूरी नहीं करता।

Shivam Y.
तेलंगाना उच्च न्यायालय ने एससी/एसटी अत्याचार मामले को खारिज कर दिया, वैवाहिक विवाद में आरोपों को सार्वजनिक अपमान नहीं माना जाएगा

तेलंगाना हाईकोर्ट ने रंगा रेड्डी ज़िले की विशेष सत्र अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला 2019 में दर्ज शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता, जो अनुसूचित जाति से संबंधित हैं, ने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी और उसके परिवार ने जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया और परेशान किया। दोनों ने 2014 में अंतरजातीय विवाह किया था, लेकिन जीवनशैली और जातिगत मतभेदों के कारण जल्द ही मतभेद शुरू हो गए।

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2018 में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि पत्नी ने उन्हें जातिसूचक गालियाँ दीं और झूठे केस में फँसाने की धमकी दी। इस शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 504 और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत केस दर्ज किया। हालाँकि पत्नी ने अदालत में दलील दी कि दोनों का 2019 में तलाक हो चुका था और यह आरोप केवल निजी विवाद से जुड़े हैं।

हाईकोर्ट ने विचार किया कि क्या इस मामले में एससी/एसटी कानून की धाराएँ लागू होती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन धाराओं के अंतर्गत अपराध तभी बनता है जब अपमान सार्वजनिक स्थान या सार्वजनिक दृष्टि में हुआ हो।

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न्यायमूर्ति वेणुगोपाल ने कहा:

"कोई भी साक्ष्य यह नहीं दर्शाता कि कथित घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई या दूसरों की उपस्थिति में हुई। ये आरोप केवल घरेलू कलह से जुड़े हैं और निजी आवास के भीतर घटित प्रतीत होते हैं।"

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020) और सुधाकर बनाम राज्य (2018) पर भरोसा किया, जिनमें कहा गया था कि निजी विवादों में बिना सार्वजनिक अपमान के एससी/एसटी कानून लागू नहीं किया जा सकता।

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अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आरोप केवल वैवाहिक विवाद से संबंधित हैं और इनमें “सार्वजनिक दृष्टि” का तत्व नहीं है। इसलिए सत्र न्यायाधीश के समक्ष लंबित एस.सी. संख्या 229/2020 की कार्यवाही को खारिज कर दिया गया। आदेश में कहा गया कि ऐसे हालात में आरोपियों को मुकदमे का सामना कराने के लिए बाध्य करना उचित नहीं होगा।

इस निर्णय से हाईकोर्ट ने दोहराया कि जातिसूचक अपमान गंभीर अपराध है, लेकिन जब तक कानूनी शर्तें पूरी नहीं होतीं, कानून को निजी विवादों तक नहीं फैलाया जा सकता।

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