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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जीएसटी याचिकाएं खारिज कीं, माल की जब्ती को बरकरार रखा और आईजीएसटी मामलों में राज्य प्राधिकरण की पुष्टि की

श्री मां ट्रेडिंग कंपनी और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जीएसटी याचिकाओं को खारिज कर दिया, झांसी में माल की जब्ती को बरकरार रखा; राज्य जीएसटी अधिकारियों को आईजीएसटी कानून के तहत अधिकृत किया।

CB News Desk
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जीएसटी याचिकाएं खारिज कीं, माल की जब्ती को बरकरार रखा और आईजीएसटी मामलों में राज्य प्राधिकरण की पुष्टि की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्री माँ ट्रेडिंग कंपनी द्वारा दायर दो रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिनमें जीएसटी अधिनियम के तहत माल की ज़ब्ती और दंड लगाने को चुनौती दी गई थी। यह मामला तब उठा जब मई 2025 में दिल्ली से रायपुर जा रहा माल झाँसी में उत्तर प्रदेश अधिकारियों द्वारा रोका गया। जाँच के समय ट्रक चालक आवश्यक दस्तावेज़ प्रस्तुत करने में असफल रहा, जिसके चलते माल को ज़ब्त कर लिया गया।

याचिकाकर्ताओं की दलील

व्यापारियों का कहना था कि ज़ब्ती अवैध थी क्योंकि सभी चालान और काग़ज़ मौजूद थे, पर चालक की गलती के कारण उन्हें प्रस्तुत नहीं किया जा सका। उनका तर्क था कि दंड आदेश जीएसटी अधिनियम की धारा 129(1)(a) के तहत जारी होना चाहिए था, जिसमें उन्हें माल का मालिक माना जाता, न कि धारा 129(1)(b) के तहत। उनके वकील ने यह भी कहा कि राज्य अधिकारियों को आईजीएसटी के तहत कार्यवाही का अधिकार नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार ने कोई विशेष अधिसूचना जारी नहीं की थी।

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याचिकाकर्ताओं ने मद्रास हाईकोर्ट के डी.के. एंटरप्राइजेज बनाम असिस्टेंट डिप्टी कमिश्नर (2022) के फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि नोटिस जारी करने में हुई देरी के कारण पूरी कार्यवाही अवैध हो जाती है।

राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने ज़ब्ती का बचाव किया। उन्होंने कहा कि आईजीएसटी अधिनियम की धारा 4 के तहत राज्य जीएसटी अधिकारी स्वतः "प्रॉपर ऑफिसर" माने जाते हैं और किसी अतिरिक्त अधिसूचना की ज़रूरत नहीं होती। उन्होंने यह भी बताया कि कारण बताओ नोटिस सात दिनों की निर्धारित अवधि में ही जारी किया गया था, इसलिए कार्यवाही कानूनी रूप से वैध है।

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि आधिकारिक सत्यापन से साबित हुआ कि लेन-देन फर्जी थे, क्योंकि न तो खरीदार और न ही विक्रेता ने उन्हें अपनी जीएसटी रिटर्न में दर्शाया। इस प्रकार, याचिकाकर्ताओं का मालिकाना दावा स्वीकार्य नहीं है।

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न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल ने 21 अगस्त 2025 को आदेश सुनाते हुए कहा:

"जब ज़ब्ती या सीज़ करने के समय कोई भी आवश्यक दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं किया गया, तो कार्यवाही सही रूप से जीएसटी अधिनियम की धारा 129(1)(b) के तहत शुरू की गई।"

अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला दिया, जिन्होंने राज्य जीएसटी अधिकारियों की इसी प्रकार की कार्यवाही को सही ठहराया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल अपवाद की स्थिति में अधिसूचना आवश्यक होती है।

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पीठ ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता अधिकारियों द्वारा दर्ज तथ्यों को चुनौती देने में विफल रहे, जिसमें यह निष्कर्ष शामिल था कि लेन-देन काल्पनिक थे।

"जब कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, तो याचिकाकर्ता की दलील का कोई औचित्य नहीं है," अदालत ने कहा।

मामले का निष्कर्ष निकालते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ज़ब्ती और दंड विधि अनुसार उचित थे। दोनों रिट याचिकाएं खारिज कर दी गईं, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि राज्य जीएसटी अधिकारी अंतरराज्यीय लेन-देन में भी कर चोरी पर कार्यवाही कर सकते हैं।

केस का शीर्षक:- श्री माँ ट्रेडिंग कंपनी और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य

केस संख्या:- Writ Tax No. 3171 of 2025

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