राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ‘आटा-साटा’ जैसी पारंपरिक विवाह प्रथा पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि नाबालिगों को इस तरह के वैवाहिक समझौतों में बांधना कानून और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। अदालत ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलटते हुए पत्नी को तलाक दे दिया और माना कि लंबे समय तक मानसिक तनाव और वैवाहिक विवादों के बीच साथ रहने को सामान्य वैवाहिक जीवन नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
किरण बिश्नोई और सुनील कुमार की शादी 31 मार्च 2016 को बीकानेर में हुई थी। पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसे दहेज की मांग, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उसके अनुसार, ससुराल पक्ष द्वारा मोटरसाइकिल और सोने के आभूषणों की मांग की गई और बाद में उसे बच्ची सहित घर से निकाल दिया गया।
दूसरी ओर, पति ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि विवाद की जड़ ‘आटा-साटा’ प्रथा थी। इस व्यवस्था के तहत पति की बहन की शादी पत्नी के भाई से हुई थी। बाद में पति की बहन ने बालिग होने पर ‘मुकलावा’ करने से इनकार कर दिया, जिससे दोनों परिवारों में तनाव बढ़ गया।
फैमिली कोर्ट ने पत्नी की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने माना था कि पत्नी ने पारिवारिक विवाद के कारण स्वेच्छा से वैवाहिक घर छोड़ा और पति के खिलाफ दायर आपराधिक मामले दबाव बनाने के लिए थे।
डिवीजन बेंच ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने ‘आटा-साटा’ विवाद और वैवाहिक क्रूरता के मुद्दों को एक साथ मिलाकर गलत निष्कर्ष निकाला। अदालत ने कहा कि किसी महिला का वर्षों तक एक घर में रहना यह साबित नहीं करता कि उसके साथ क्रूरता नहीं हुई। कई महिलाएं सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और बच्चों की वजह से कठिन परिस्थितियों में भी विवाह निभाती रहती हैं।
अदालत ने कहा,
“सिर्फ साथ रहना, सुखद वैवाहिक जीवन का प्रमाण नहीं माना जा सकता।”
पीठ ने यह भी कहा कि पत्नी द्वारा भरण-पोषण या अन्य कानूनी कार्यवाही शुरू करना “दबाव बनाने का तरीका” नहीं बल्कि अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम था।
फैसले में अदालत ने ‘आटा-साटा’ प्रथा को लेकर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि यह व्यवस्था कई बार बच्चों, खासकर लड़कियों, को “वैवाहिक सौदेबाजी” का हिस्सा बना देती है।
पीठ ने कहा,
“कोई भी परंपरा कानून से ऊपर नहीं हो सकती। बेटी किसी दूसरे विवाह की गारंटी या सौदे का हिस्सा नहीं है।”
अदालत ने यह भी कहा कि नाबालिग लड़की को बचपन में तय विवाह को बाद में स्वीकार करने के लिए सामाजिक दबाव में रखना उसकी स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि पति-पत्नी पिछले पांच वर्षों से अलग रह रहे हैं और सुलह की संभावना नहीं बची है। अदालत ने फैमिली कोर्ट का 24 सितंबर 2025 का फैसला रद्द करते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत विवाह समाप्त कर दिया।
साथ ही स्पष्ट किया कि इस फैसले का असर लंबित आपराधिक या अभिरक्षा मामलों पर नहीं पड़ेगा।
Case Details
Case Title: Kiran Bishnoi v. Sunil Kumar
Case Number: D.B. Civil Miscellaneous Appeal No. 3506/2025
Judge: Justice Arun Monga and Justice Sunil Beniwal
Decision Date: 10 April 2026











