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बिना आरोप तय किए दोषसिद्धि अस्वीकार्य: सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना चार्ज तय किए सजा नहीं दी जा सकती और अपहरण व हत्या अलग अपराध हैं, इसलिए यूपी सरकार की अपील खारिज की गई। - उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राम स्वरूप @ बरकत

Vivek G.
बिना आरोप तय किए दोषसिद्धि अस्वीकार्य: सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आपराधिक मामले में साफ कर दिया है कि बिना उचित चार्ज तय किए किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

यह मामला एक ऐसे आरोपी से जुड़ा था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने अपहरण (Section 364 IPC) में दोषी ठहराया था, जबकि उस पर हत्या (Section 302 IPC) का चार्ज लगाया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 1998 का है। शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी राम स्वरूप ने उसके बेटे दिनेश को फिल्म दिखाने के बहाने घर से ले गया। अगले दिन उसकी लाश गोली के घावों के साथ मिली।

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इस घटना के बाद हत्या का केस दर्ज हुआ। ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के आधार पर हत्या का आरोप साबित नहीं माना, लेकिन यह मानते हुए कि आरोपी ने मृतक को घर से बाहर ले गया था, उसे धारा 364 IPC के तहत दोषी ठहरा दिया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस सजा को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों पर जोर दिया।

अदालत ने कहा कि:

“धारा 364 IPC और धारा 302 IPC अलग-अलग अपराध हैं, इनके तत्व (ingredients) समान नहीं हैं।”

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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

“किसी आरोपी को उस अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जिसके लिए उस पर औपचारिक रूप से आरोप तय ही नहीं किया गया हो।”

पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 222 की व्याख्या करते हुए कहा कि “माइनर ऑफेंस” (कम गंभीर अपराध) वही माना जाएगा, जिसमें मुख्य तत्व समान हों।

लेकिन यहां:

  • हत्या (Section 302) और
  • अपहरण (Section 364)

दोनों के कानूनी तत्व पूरी तरह अलग हैं, इसलिए एक को दूसरे का “माइनर ऑफेंस” नहीं माना जा सकता।

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सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों की भी बारीकी से जांच की।

कोर्ट ने पाया कि:

  • कहीं भी यह साबित नहीं हुआ कि आरोपी ने मृतक को जबरदस्ती ले गया
  • गवाहों के बयान hearsay (सुनी-सुनाई बात) पर आधारित थे
  • किसी ठोस मकसद (motive) का भी अभाव था

कोर्ट ने कहा:

“सिर्फ इस आधार पर कि मृतक आरोपी के साथ गया था, सजा कायम नहीं रखी जा सकती।”

इन तथ्यों ने अभियोजन के मामले को कमजोर कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट ने अंततः कहा कि हाईकोर्ट का फैसला सही था और ट्रायल कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की थी।

“हम इस अपील में कोई मेरिट नहीं पाते, अतः अपील खारिज की जाती है।”

इस प्रकार, आरोपी की बरी (acquittal) को बरकरार रखा गया और उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज कर दी गई।

Case Details

Case Number: Criminal Appeal No. 443 of 2012

Case Title: State of Uttar Pradesh vs Ram Swaroop @ Barkat

Judge: Justice Aravind Kumar, Justice Augustine George Masih

Decision Date: March 18, 2026

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