आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों में बच्चों को डीएनए टेस्ट के लिए मजबूर करना आसान रास्ता नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे परीक्षण बच्चों की गरिमा और पहचान पर गंभीर असर डाल सकते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा है, जिसमें पति ने परित्याग का आरोप लगाते हुए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ib) के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। विजयनगरम के वरिष्ठ सिविल जज के समक्ष तलाक की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान, पति ने दंपति के दो बच्चों के डीएनए परीक्षण की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया।
उन्होंने तर्क दिया कि परीक्षण से यह साबित करने में मदद मिलेगी कि वह जैविक पिता नहीं हैं, जिससे उनकी पत्नी के खिलाफ उनके दावों को बल मिलेगा। हालांकि, निचली अदालत ने जुलाई 2024 में इस दलील को खारिज कर दिया, जिसके बाद उन्होंने दीवानी पुनरीक्षण याचिका के माध्यम से उच्च न्यायालय का रुख किया।
Read also:- ग्रेच्युटी रोक सकते हैं नियोक्ता, लेकिन संतुलन जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने तय किया ₹1000 मासिक पेनल रेंट
याचिकाकर्ता (पति) की ओर से कहा गया कि:
- डीएनए टेस्ट “सत्य का पता लगाने” का सबसे प्रभावी तरीका है
- इससे किसी को अनुचित नुकसान नहीं होगा
- यह निष्पक्ष सुनवाई (fair trial) का हिस्सा है
वहीं, प्रतिवादी (पत्नी) की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि:
- डीएनए टेस्ट बहुत संवेदनशील मुद्दा है
- इससे बच्चे की सामाजिक पहचान और सम्मान प्रभावित हो सकता है
जस्टिस तारलादा राजशेखर राव ने सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
Read also:- अगर पत्नी प्रेमी के साथ गई तो कोर्ट कुछ नहीं कर सकता, लेकिन बच्चों की सुरक्षा जरूरी: मद्रास हाईकोर्ट
अदालत ने कहा:
“बच्चे को माता-पिता के विवाद में मोहरे की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।”
साथ ही, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि:
“डीएनए टेस्ट को हर मामले में सामान्य प्रक्रिया की तरह नहीं अपनाया जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून के तहत यह मजबूत धारणा (presumption) होती है कि विवाह के दौरान जन्मा बच्चा वैध होता है। बिना ठोस कारण के इस धारणा को तोड़ा नहीं जा सकता।
एक अहम टिप्पणी में अदालत ने कहा:
“न्याय पाने के लिए किसी तीसरे व्यक्ति यहां बच्चे के अधिकारों का बलिदान नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने पाया कि:
- तलाक का मामला “परित्याग” के आधार पर है, न कि पितृत्व विवाद पर
- बच्चों को मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है
- पति के पास पत्नी के कथित संबंध साबित करने के अन्य कानूनी तरीके उपलब्ध हैं
इन कारणों से हाईकोर्ट ने सिविल रिवीजन याचिका खारिज कर दी।
साथ ही, अदालत ने याचिकाकर्ता पर ₹3,000 का खर्च (cost) लगाया, जिसे तीन सप्ताह के भीतर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को जमा करना होगा।
Case Title:- X and Y
Case Number: Civil Revision Petition No. 3393 of 2025
Decision Date: 12 March 2026
Counsels:
- Petitioner: M.M.M. Krishna Sanapala
- Respondent: Arrabolu Sai Naveen










