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डीएनए जांच पर माँ की सहमति भी पर्याप्त नहीं, कोर्ट को बच्चे के अधिकारों की रक्षा करनी होगी: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा, डीएनए टेस्ट का आदेश बच्चे के हित में ही दिया जा सकता है, माँ की सहमति ही पर्याप्त नहीं। पढ़ें पूरा मामला और कानूनी विश्लेषण।

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डीएनए जांच पर माँ की सहमति भी पर्याप्त नहीं, कोर्ट को बच्चे के अधिकारों की रक्षा करनी होगी: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि भले ही माँ अपने बच्चे के डीएनए टेस्ट के लिए सहमति दे दे, फिर भी अदालत को बच्चे के हितों का संरक्षक बनकर विचार करना होगा कि यह टेस्ट कराना सही होगा या नहीं। अदालत ने यह भी साफ किया कि नाबालिग बच्चा स्वयं इस तरह के टेस्ट के लिए सहमति या असहमति नहीं दे सकता।

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यह फैसला न्यायमूर्ति आर.एम. जोशी ने 1 जुलाई 2025 को दिया। यह मामला एक महिला द्वारा फैमिली कोर्ट के 7 फरवरी 2020 के आदेश को चुनौती देने से जुड़ा था, जिसमें उसके बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया था। यह आदेश महिला के पति की उस याचिका पर आया था, जिसमें उन्होंने संदेह जताया था कि बच्चा उनका नहीं है, क्योंकि पत्नी कथित रूप से विवाहेतर संबंधों में थी और बच्चा अलग रहने के बाद पैदा हुआ।

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हालांकि, महिला ने दावा किया कि जब उसने पति का घर छोड़ा तब वह पहले ही तीन महीने की गर्भवती थी, और पति को इस बात की जानकारी थी।

"भले ही पत्नी ने कहा हो कि अगर कोर्ट कहे तो वह डीएनए टेस्ट करवाने को तैयार है, फिर भी कोर्ट का यह कर्तव्य है कि वह बच्चे के सर्वोत्तम हितों पर विचार करे," — न्यायमूर्ति आर.एम. जोशी

मामले की पृष्ठभूमि

  • शादी 18 दिसंबर 2011 को हुई थी
  • महिला ने 19 जनवरी 2013 को ससुराल छोड़ा, जब वह तीन महीने की गर्भवती थी
  • पति ने 28 जनवरी 2013 को महिला को घर लौटने का नोटिस भेजा — इसमें कोई पितृत्व संदेह नहीं था
  • पति ने बाद में पत्नी पर व्यभिचार, क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की
  • बच्चा 27 जुलाई 2013 को पैदा हुआ

पति ने पहले एक मजिस्ट्रेट कोर्ट में डीएनए टेस्ट की मांग की थी, जिसे 2016 में खारिज कर दिया गया था। लेकिन 2020 में फैमिली कोर्ट ने डीएनए टेस्ट की अनुमति दे दी, जिससे पत्नी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

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कानूनी मान्यता और धारा 112

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के अनुसार:

"अगर बच्चा वैध विवाह के दौरान जन्मा है, तो माना जाता है कि वह पति का ही संतान है, जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि पति और पत्नी के बीच उस समय कोई संपर्क नहीं था।"

इस मामले में पति ने कभी यह दावा नहीं किया कि उसे पत्नी तक पहुँच नहीं थी या वह पिता नहीं है। ऐसे में बच्चे का डीएनए टेस्ट करवाना उचित नहीं है।

वैज्ञानिक टेस्ट बनाम वैधानिक धारणा

हालाँकि पति ने डीएनए परीक्षण की वैज्ञानिक सटीकता पर ज़ोर दिया, लेकिन अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा:

"डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट होने के बावजूद, जब तक यह सिद्ध नहीं होता कि पति और पत्नी के बीच संबंध नहीं थे, तब तक बच्चे की वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती।"

सिर्फ पत्नी के चरित्र पर सवाल उठाकर बच्चे की वैधता पर संदेह करना कानूनन गलत है।

फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द

अंत में, हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने बच्चे के अधिकारों और वैधानिक प्रावधानों पर विचार किए बिना डीएनए टेस्ट की अनुमति दे दी थी।

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"बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना अदालत की ज़िम्मेदारी है। जब माता-पिता झगड़े में हों, तब बच्चे को कानूनी लड़ाई का औजार नहीं बनाया जाना चाहिए," — न्यायमूर्ति जोशी

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए डीएनए टेस्ट संबंधी याचिका को खारिज कर दिया।

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