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राजस्थान उच्च न्यायालय ने बिना अलग कोटा के ट्रांसजेंडर आरक्षण पर राज्य की नीति पर सवाल उठाए

राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों पर सुनवाई करते हुए कहा कि केवल OBC में शामिल करना पर्याप्त नहीं, बल्कि वास्तविक लाभ सुनिश्चित करना जरूरी है। - गंगा कुमारी बनाम राजस्थान राज्य और अन्य।

Shivam Y.
राजस्थान उच्च न्यायालय ने बिना अलग कोटा के ट्रांसजेंडर आरक्षण पर राज्य की नीति पर सवाल उठाए

जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कागज़ी वर्गीकरण नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का वास्तविक लाभ सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। मामला ट्रांसजेंडर समुदाय को आरक्षण देने के तरीके से जुड़ा था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता गंगा कुमारी, जो स्वयं ट्रांसजेंडर हैं, ने राज्य सरकार की उस अधिसूचना को चुनौती दी जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में शामिल किया गया था, लेकिन उन्हें अलग से आरक्षण नहीं दिया गया।

याचिका में कहा गया कि इससे ट्रांसजेंडर समुदाय को वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है और यह सुप्रीम कोर्ट के NALSA बनाम भारत संघ फैसले की भावना के खिलाफ है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को “तीसरे लिंग” के रूप में मान्यता देते हुए उन्हें सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग मानकर आरक्षण देने के निर्देश दिए गए थे।

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याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि केवल OBC में शामिल करना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इससे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को प्रतिस्पर्धा में वास्तविक अवसर नहीं मिलते।

उनका कहना था कि समुदाय पहले से ही सामाजिक भेदभाव, आर्थिक कठिनाई और रोजगार के अवसरों की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में अलग से “क्षैतिज आरक्षण” (horizontal reservation) जरूरी है ताकि उन्हें समान अवसर मिल सके।

राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि ट्रांसजेंडर समुदाय को पहले ही OBC श्रेणी में शामिल कर दिया गया है, जिससे उन्हें शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिल रहा है।

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि आरक्षण की संरचना तय करना नीति का विषय है और इसमें अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

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डिवीजन बेंच ने अपने विस्तृत आदेश में समाज में ट्रांसजेंडर समुदाय की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा:

“समाज अक्सर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के दर्द और संघर्ष को समझने में विफल रहता है, जबकि उन्हें समान सम्मान और अधिकार मिलना चाहिए।”

अदालत ने यह भी कहा कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकार केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें वास्तविक जीवन में लागू किया जाना जरूरी है।

“प्रश्न यह नहीं है कि अधिकार मौजूद हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वे वास्तव में लागू हो रहे हैं।”

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अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को केवल औपचारिक रूप से नहीं, बल्कि प्रभावी तरीके से लागू करना होगा।

कोर्ट ने इस मुद्दे को व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा और यह संकेत दिया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए नीतियों का वास्तविक प्रभाव सुनिश्चित करना आवश्यक है।

Case Details

Case Title: Ganga Kumari v. State of Rajasthan & Ors.

Case Number: D.B. Civil Writ Petition No. 1358/2025

Court: High Court of Judicature for Rajasthan, Jodhpur

Judges: Justice Arun Monga & Justice Yogendra Kumar Purohit

Decision Date: 30 March 2026

Counsels:

  • Petitioner: Vivek Mathur, Prakash Kumar Balout, Dhirendra Singh Sodha
  • Respondents: Deepak Chandak (for AAG), Piyush Bhandari, Mahesh Thanvi, Pragya Thanvi

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