इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दहेज मृत्यु से जुड़े एक गंभीर आपराधिक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि केवल आरोप लगना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस और मजबूत साक्ष्य के बिना किसी अतिरिक्त व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 319 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत अन्य ससुराल पक्ष को तलब न करने के आदेश को सही ठहराया।
यह फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला राधिका की मौत से जुड़ा है, जिसकी शादी घटना से लगभग पांच साल पहले मनोज से हुई थी। उसके पिता, मान सिंह ने जनवरी 2020 में कौशांबी जिले के मोहब्बतपुर पैंसा पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि राधिका को भैंस और सोने की अंगूठी सहित अतिरिक्त दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था। इसमें पति और उसके परिवार के सदस्यों - ससुर, सास, देवर और एक रिश्तेदार - पर उसकी हत्या करने और मौत को आत्महत्या का रूप देने का भी आरोप लगाया गया था।
प्रारंभ में, पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (क्रूरता), 304B/302 (दहेज हत्या/हत्या) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मामले दर्ज किए। हालांकि, लगभग 19 गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद, जांच अधिकारी ने केवल पति मनोज के खिलाफ ही आरोप पत्र दाखिल किया, यह निष्कर्ष निकालते हुए कि परिवार के अन्य सदस्यों की संलिप्तता दर्शाने वाला कोई सबूत नहीं था।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत आवेदन
मुकदमे की सुनवाई के दौरान, मृतक के दो करीबी रिश्तेदारों (अभियोजन पक्ष के दो गवाहों) के बयान दर्ज किए जाने के बाद, शिकायतकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत एक आवेदन दायर किया। यह प्रावधान न्यायालय को ऐसे व्यक्ति को तलब करने की अनुमति देता है जो पहले से आरोपी नहीं है, यदि मुकदमे के दौरान साक्ष्य से अपराध में उसकी संलिप्तता साबित होती है।
निचली अदालत ने नवंबर 2024 में आवेदन खारिज कर दिया। इसे चुनौती देते हुए, शिकायतकर्ता ने उच्च न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि गवाहों की गवाही से स्पष्ट रूप से ससुराल वालों की भूमिका का पता चलता है और निचली अदालत ने स्थापित कानून की अनदेखी की है।
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कोर्ट की टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति चवन प्रकाश ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों का गहराई से परीक्षण किया। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि:
- प्रमुख गवाहों ने जिरह में स्वीकार किया कि दहेज की मांग सीधे तौर पर पति द्वारा की गई थी।
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृत्यु का कारण फांसी था।
- जांच अधिकारी और चिकित्सक के बयानों से यह संकेत मिला कि अन्य आरोपी अलग रह रहे थे।
पीठ ने कहा,
“धारा 319 CrPC एक असाधारण शक्ति है, जिसका प्रयोग बहुत सावधानी और ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।”
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि सिर्फ संदेह या सामान्य आरोप के आधार पर किसी को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता।
अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों और कानून के स्थापित सिद्धांतों पर विचार करते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश तर्कसंगत और कानून के अनुरूप है।
अंततः न्यायालय ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इसमें कोई दम नहीं है, और निचली अदालत का आदेश बरकरार रखा जाता है
Case Title: Man Singh vs State of Uttar Pradesh and 3 Others
Case Number: Criminal Revision No. 6573 of 2024









