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क्या सरकारी वकील किसी निजी पक्ष का बचाव कर सकता है? इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश विधि विभाग से रिपोर्ट मांगी है।

मीरा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यूपी विधि सचिव से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या अतिरिक्त मुख्य स्थायी वकील राज्य से जुड़े मामले में निजी पक्ष का बचाव कर सकते हैं।

Shivam Y.
क्या सरकारी वकील किसी निजी पक्ष का बचाव कर सकता है? इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश विधि विभाग से रिपोर्ट मांगी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम सवाल पर उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत यह जानना चाहती है कि क्या राज्य सरकार की ओर से नियुक्त अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता (Additional Chief Standing Counsel) किसी ऐसे मामले में निजी व्यक्ति की तरफ से पेश हो सकता है, जिसमें राज्य सरकार खुद एक पक्ष हो।

यह सवाल वर्ष 2018 से लंबित एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई के दौरान उठा। यह याचिका एक महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की थी, जिसमें उसकी धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की मांग खारिज कर दी गई थी। इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार भी एक पक्ष है।

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सुनवाई के दौरान अधिवक्ता इंद्रसेन सिंह तोमर जो राज्य सरकार के अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता हैं ने पति, यानी निजी प्रतिवादी की ओर से पेश होने की अनुमति मांगी।

इस पर पत्नी की ओर से कड़ा विरोध दर्ज कराया गया। दलील दी गई कि जब कोई वकील राज्य सरकार के लिए नियुक्त है, तो वह उसी मामले में किसी निजी व्यक्ति का पक्ष नहीं रख सकता, जहां सरकार पहले से पक्षकार हो।

मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र समंत ने कहा कि यह सिर्फ एक केस तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि सरकारी वकीलों के कर्तव्यों और सीमाओं से जुड़ा बड़ा प्रश्न है।

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पीठ ने टिप्पणी की,

“इस विषय पर राज्य के विधि विभाग की स्पष्ट राय और नियमों की जानकारी आवश्यक है।”

अदालत ने अब उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (विधि) एवं विधिक परामर्शी को निर्देश दिया है कि वे दो सप्ताह के भीतर एक रिपोर्ट दाखिल करें। इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि क्या किसी अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता को राज्य से जुड़े मामले में निजी पक्ष की ओर से पेश होने की अनुमति है।

मामले की अगली सुनवाई रिपोर्ट आने के बाद होगी।

Case Title: Meera Devi vs State of Uttar Pradesh and Another

Case Number: Criminal Revision No. 2843 of 2018

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