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मानसिक क्रूरता और परित्याग साबित: कलकत्ता हाईकोर्ट ने डॉक्टर पत्नी की तलाक याचिका मंजूर की

डॉ. सोमा मंडल देबनाथ बनाम श्री तन्मय देबनाथ - कलकत्ता उच्च न्यायालय ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह भंग कर दिया, जिसमें लंबे समय से अलग रह रहे दंपति के मामले में क्रूरता, परित्याग और अपूरणीय वियोग सिद्ध होने की पुष्टि की गई।

Shivam Y.
मानसिक क्रूरता और परित्याग साबित: कलकत्ता हाईकोर्ट ने डॉक्टर पत्नी की तलाक याचिका मंजूर की

लगभग दो दशक पुराने वैवाहिक विवाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने डॉक्टर पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा तलाक से इनकार करने का आदेश पलट दिया। पीठ ने साफ कहा कि पति की ओर से मानसिक क्रूरता और लंबे समय से परित्याग (desertion) साबित होता है, जिससे विवाह संबंध व्यावहारिक रूप से समाप्त हो चुका है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला डॉ. सोमा मंडल देबनाथ बनाम श्री तन्मय देबनाथ के बीच का है। दोनों की शादी 18 जून 2007 को विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत हुई थी। पत्नी एक मेडिकल डॉक्टर हैं और सरकारी सेवा में कार्यरत रहीं। वर्ष 2015 में उनके कुरसेओंग स्थानांतरण के बाद दंपती का साथ रहना लगभग समाप्त हो गया।

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पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने उनके साथ मानसिक उत्पीड़न किया, उनकी आय का बड़ा हिस्सा लिया, कार्यस्थल पर बदनामी की और परिवार की जिम्मेदारियों से दूरी बना ली। ट्रायल कोर्ट ने 2022 में इन आरोपों को पर्याप्त रूप से सिद्ध न मानते हुए तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

अदालत की सुनवाई और प्रमुख दलीलें

अपील की सुनवाई न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति सुप्रतिम भट्टाचार्य की खंडपीठ ने की। पत्नी की ओर से कहा गया कि पति ने उनके कार्यस्थल पर आकर उन्हें अपमानित किया और चरित्र पर सवाल उठाए, जो मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

यह भी बताया गया कि ट्रायल कोर्ट ने तकनीकी कारणों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गवाहों की गवाही लेने से मना कर दिया, जिससे पत्नी को अपना पक्ष पूरी तरह रखने का अवसर नहीं मिला।

वहीं पति ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वह विवाह बनाए रखना चाहते हैं और बेटे से मिलने का अधिकार चाहते हैं।

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कोर्ट की टिप्पणियाँ

खंडपीठ ने माना कि पति द्वारा पत्नी के आरोपों का स्पष्ट और ठोस खंडन नहीं किया गया। कई महत्वपूर्ण आरोपों पर केवल औपचारिक इनकार किया गया, जिसे अदालत ने “इवेसिव डिनायल” (टालने वाला जवाब) माना।

अदालत ने कहा,

“सिविल मामलों में सबूत का मानदंड संभावनाओं के संतुलन पर आधारित होता है। यहां उपलब्ध सामग्री से यह स्पष्ट है कि पत्नी को मानसिक क्रूरता और परित्याग का सामना करना पड़ा।”

पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि 2015 के बाद दोनों का साथ रहना केवल कभी-कभार की मुलाकातों तक सीमित रहा, जिसे दांपत्य जीवन नहीं कहा जा सकता।

अपरिवर्तनीय टूटन पर अदालत का दृष्टिकोण

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भले ही “अपरिवर्तनीय विवाह टूटन” भारतीय कानून में स्वतंत्र आधार न हो, लेकिन इसे मानसिक क्रूरता का एक अहम तत्व माना जा सकता है।

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पीठ ने टिप्पणी की कि,

“कानूनी तौर पर जीवित लेकिन भावनात्मक रूप से मृत विवाह को जबरन बनाए रखना दोनों पक्षों के लिए पीड़ा का कारण बनता है।”

अदालत ने पाया कि यह विवाह वर्षों से केवल नाममात्र का रह गया है।

अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए विवाह को भंग करने का निर्देश दिया और पत्नी को तलाक प्रदान किया। साथ ही, नाबालिग बेटे के हित को ध्यान में रखते हुए पिता को सीमित मुलाकात का अधिकार दिया गया।

इसके साथ ही सभी अंतरिम आदेश समाप्त कर दिए गए और मामले का निपटारा कर दिया गया।

Case Title: Dr. Soma Mandal Debnath vs. Sri Tanmoy Debnath

Case Number: F.A. No. 190 of 2022

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