भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा द्वारा दायर याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। याचिका में उनके खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी गई है। अदालत ने समिति के समक्ष जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय देने से भी इनकार कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद पिछले वर्ष मार्च में तब सामने आया, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने की खबर आई। उस समय वह दिल्ली हाईकोर्ट में पदस्थ थे। इसके बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया।
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घटना के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने एक आंतरिक जांच के आदेश दिए। तीन सदस्यीय जांच समिति ने 4 मई को अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए जस्टिस वर्मा को कदाचार का दोषी पाया। रिपोर्ट के आधार पर उन्हें इस्तीफा देने या महाभियोग का सामना करने की सलाह दी गई थी। इस्तीफा देने से इनकार करने पर रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई।
याचिकाकर्ता की दलीलें
जस्टिस वर्मा ने पहले भी आंतरिक जांच रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन अगस्त में उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके कुछ ही दिनों बाद लोकसभा अध्यक्ष Om Birla ने एक अलग तीन सदस्यीय संसदीय जांच समिति का गठन किया।
इस समिति की वैधता को चुनौती देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि इसका गठन Judges (Inquiry) Act के प्रावधानों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि जब किसी न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव दोनों सदनों में एक ही दिन पेश किए जाएं, तो समिति तभी बन सकती है जब दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार हों।
रोहतगी ने कहा,
“यहां लोकसभा में प्रस्ताव स्वीकार हुआ, लेकिन राज्यसभा में उसे खारिज कर दिया गया। ऐसे में केवल लोकसभा अध्यक्ष द्वारा समिति बनाना कानून के अनुरूप नहीं है।”
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अदालत की सुनवाई और निर्णय
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने की। विस्तृत बहस सुनने के बाद अदालत ने याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया।
हालांकि, संसदीय जांच समिति के समक्ष जवाब दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाने की जस्टिस वर्मा की अंतरिम मांग को अदालत ने ठुकरा दिया।
अब उन्हें 12 जनवरी तक ही अपना जवाब दाखिल करना होगा।










