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दिल्ली हाईकोर्ट ने बहू की अपील खारिज की, सास की संपत्ति पर अधिकार बरकरार

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा तलाक के बाद बहू का ससुराल के घर पर कोई अधिकार नहीं, रोहिणी संपत्ति में सास का मालिकाना हक बरकरार।

Court Book (Admin)
दिल्ली हाईकोर्ट ने बहू की अपील खारिज की, सास की संपत्ति पर अधिकार बरकरार

परिवारिक संपत्ति विवाद के एक अहम मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बहू X की अपील खारिज कर दी है। इस अपील में X ने अपनी सास Y द्वारा दाखिल केस को चुनौती दी थी। अदालत ने साफ किया कि रोहिणी, दिल्ली में स्थित घर Y की निजी संपत्ति है और तलाक के बाद X का वहाँ बने रहने का कोई कानूनी हक़ नहीं है।

जस्टिस अनिल क्षेतरपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने अपना फैसला 21 अगस्त 2025 को सुनाते हुए पहले के फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। फैमिली कोर्ट ने X को छह महीने के भीतर घर खाली करने का आदेश दिया था।

X ने दलील दी थी कि 1999 में शादी के बाद से वह इस घर में रह रही है, इसलिए यह उसका “वैवाहिक घर” और घरेलू हिंसा कानून (PWDV Act) के तहत “साझा गृह” माना जाना चाहिए। साथ ही उसने यह भी कहा कि उसके परिवार ने इस संपत्ति की खरीद और निर्माण में आर्थिक योगदान दिया था।

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लेकिन अदालत ने टिप्पणी की: “एक बार विवाह का तलाक के जरिए अंत हो जाने के बाद घरेलू संबंध भी समाप्त हो जाता है। ऐसे में PWDV अधिनियम की धारा 17 के तहत निवास का अधिकार लागू नहीं किया जा सकता।”

न्यायालय ने साफ किया कि घरेलू हिंसा कानून के तहत निवास का अधिकार केवल सुरक्षा देता है, यह स्थायी स्वामित्व या विवाह खत्म होने के बाद स्वतः रहने का अधिकार नहीं देता।

Y ने 2011 का पंजीकृत कन्वेअंस डीड और 2013 की वसीयत प्रस्तुत कर अपनी मालिकाना हक साबित किया। अदालत ने दोनों दस्तावेजों को वैध बताया और X का यह आरोप खारिज कर दिया कि ये फर्जी हैं।

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पीठ ने कहा: “जब किसी पक्ष द्वारा वैध पंजीकृत दस्तावेज़ पेश किए जाते हैं, तो विपरीत पक्ष पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह दबाव या आर्थिक योगदान को साबित करे। इस मामले में वह जिम्मेदारी पूरी नहीं हुई।”

यह फैसला उन परिवारिक विवादों पर व्यापक असर डालेगा, जिनमें बहुएं सास-ससुर की स्व-खरीदी संपत्ति पर निवास का दावा करती हैं। कानूनी जानकार मानते हैं कि यह निर्णय दोहराता है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत ‘साझा गृह’ का अधिकार तभी तक टिकता है, जब तक विवाह या घरेलू संबंध जीवित हो।

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इस फैसले के बाद X को रोहिणी स्थित घर में रहने का अधिकार नहीं मिला, जबकि Y के वारिस उसका पूरा अधिकार बरकरार रखने में सफल रहे। अदालत ने निष्कर्ष में कहा: “हमें फैमिली कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। अपील खारिज की जाती है।”

केस शीर्षक: X बनाम Y

केस संख्या: MAT.APP.(F.C.) 348/2024, CM APPL. 62203/2024 एवं CM APPL. 29620/2025

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