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गंभीर अपराधों में परिवीक्षा नहीं दी जा सकती: दिल्ली उच्च न्यायालय ने बाल यौन उत्पीड़न मामले में दोषी को वापस जेल भेजा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO मामले में दोषी को प्रोबेशन देने से इनकार करते हुए 10 साल की सजा और ₹10.5 लाख मुआवजा बरकरार रखा। - दिल्ली राज्य बनाम दीपक

Shivam Y.
गंभीर अपराधों में परिवीक्षा नहीं दी जा सकती: दिल्ली उच्च न्यायालय ने बाल यौन उत्पीड़न मामले में दोषी को वापस जेल भेजा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ऐसे अपराध, जिनमें उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान हो, उनमें दोषी को प्रोबेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता। अदालत ने पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को 10 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई और पीड़िता को ₹10.5 लाख मुआवजा देने का निर्देश भी दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दिल्ली सरकार द्वारा दायर अपील से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने 4 मई 2026 को ट्रायल कोर्ट के बरी करने वाले फैसले को पलटते हुए आरोपी दीपक को IPC की धारा 363, 366, 342 और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया था।

सजा पर सुनवाई के दौरान दोषी की ओर से अदालत से नरमी बरतने और प्रोबेशन पर रिहा करने की मांग की गई। बचाव पक्ष ने कहा कि घटना के समय आरोपी की उम्र 21 वर्ष थी, उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य है। यह भी कहा गया कि मामला 2014 का है और अब दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं।

वहीं, राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक ने कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा 6 में न्यूनतम 10 साल की सजा अनिवार्य है, इसलिए प्रोबेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता।

न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुडेजा की खंडपीठ ने कहा कि अपराधी परिवीक्षा अधिनियम का लाभ केवल कम गंभीर अपराधों में दिया जा सकता है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा,

“ऐसे अपराध जिनमें उम्रकैद की सजा संभव हो, वे प्रोबेशन के दायरे से बाहर रहते हैं।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रोबेशन कानून के तहत उम्र की गणना अपराध की तारीख से नहीं, बल्कि सजा सुनाए जाने की तारीख से की जाती है। चूंकि मई 2026 में दोषसिद्धि के समय आरोपी की उम्र 21 वर्ष से अधिक थी, इसलिए उसे इस कानून का लाभ नहीं मिल सकता।

अदालत ने कहा कि पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया विशेष कानून है और इसमें सख्त सजा का प्रावधान जानबूझकर रखा गया है।

अदालत ने यह ध्यान में रखा कि दोषी पहले ही जांच और ट्रायल के दौरान लगभग 5 साल 7 महीने जेल में बिता चुका है और उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। इसके बावजूद अदालत ने कानून में निर्धारित न्यूनतम सजा देने का फैसला किया।

हाईकोर्ट ने दोषी को:

  • POCSO Act की धारा 6 के तहत 10 साल की कठोर कैद,
  • IPC धारा 366 के तहत 7 साल,
  • IPC धारा 363 के तहत 3 साल,
  • और IPC धारा 342 के तहत 3 महीने की सजा सुनाई।

सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

इसके अलावा अदालत ने पीड़िता को मानसिक और भावनात्मक क्षति को देखते हुए ₹10.5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषी की प्रोबेशन याचिका खारिज करते हुए उसे शेष सजा काटने के लिए तुरंत हिरासत में लेने का आदेश दिया। इसके साथ ही अपील का निपटारा कर दिया गया।

Case Details:

Case Title: State of NCT of Delhi v. Deepak

Case Number: CRL.A. 236/2021

Judges: Justice Navin Chawla and Justice Ravinder Dudeja

Decision Date: May 20, 2026

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