दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत अपील दाखिल करने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि केवल समय सीमा के भीतर ई-फाइलिंग कर देना पर्याप्त नहीं है, यदि अपील आवश्यक दस्तावेजों के बिना दाखिल की गई हो।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला NCLT, कोच्चि द्वारा 14 अगस्त 2024 को मंजूर किए गए एक रेजोल्यूशन प्लान से जुड़ा था। यह प्लान एंजलवुड्स अपार्टमेंट अलॉटीज़ एसोसिएशन की ओर से प्रस्तुत किया गया था।
इसके खिलाफ एम. ललिता ने NCLAT, चेन्नई में अपील दायर की। उन्होंने खुद को कॉरपोरेट देनदार की वित्तीय ऋणदाता बताया। अपील 28 सितंबर 2024 को ई-फाइल की गई थी, जो निर्धारित 45 दिनों की अधिकतम समय सीमा का आखिरी दिन था।
हालांकि, अपील में कई खामियां थीं। बाद में देरी माफी के लिए दो अलग-अलग आवेदन दाखिल किए गए - एक मूल देरी के लिए और दूसरा 150 दिनों की देरी से री-फाइलिंग के लिए।
NCLAT ने नवंबर 2025 में देरी माफ करते हुए अपील स्वीकार कर ली थी। ट्रिब्यूनल ने कहा कि री-फाइलिंग में हुई देरी मुख्य रूप से अपीलकर्ता और अदालत के बीच का विषय है।
साथ ही, 50,000 रुपये प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराने की शर्त पर देरी माफ कर दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड मंगवाकर जांच की तो पाया कि अपील में कई गंभीर कमियां बनी रहीं। सबसे अहम बात यह थी कि अपील के साथ NCLT के आदेश की प्रमाणित प्रति दाखिल ही नहीं की गई थी।
अदालत ने कहा कि NCLAT नियमों के तहत प्रमाणित प्रति दाखिल करना अनिवार्य है।
पीठ ने कहा,
“सिर्फ ई-फाइलिंग कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता, यदि अपील आवश्यक शर्तों को पूरा ही न करती हो।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि संबंधित पक्ष ने प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन ही 21 अप्रैल 2025 को किया, जबकि अपील इससे पहले ही री-फाइल की जा चुकी थी।
पीठ ने कहा कि यह केवल तकनीकी कमी नहीं थी, बल्कि अपील की वैधता से जुड़ा मूल प्रश्न था।
अदालत ने अपने पुराने फैसले वी. नागराजन बनाम एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड का हवाला देते हुए कहा कि प्रमाणित प्रति प्राप्त करने के लिए समय रहते आवेदन करना यह दिखाता है कि पक्षकार मुकदमे को गंभीरता और सावधानी से आगे बढ़ा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस तरीके से अपील दायर और दोबारा दाखिल की गई, वह “कानूनी रूप से अस्वीकार्य” थी। अदालत ने माना कि NCLAT ने देरी माफ करते समय यह जांच ही नहीं की कि अपील विधिसम्मत तरीके से दाखिल हुई थी या नहीं।
पीठ ने कहा,
“यह केवल दोषपूर्ण अपील नहीं थी, बल्कि ऐसी अपील थी जो आवश्यक कानूनी शर्तों को पूरा ही नहीं करती थी।”
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT का 10 नवंबर 2025 का आदेश रद्द कर दिया और एंजलवुड्स अपार्टमेंट अलॉटीज़ एसोसिएशन की अपील स्वीकार कर ली।
दोनों पक्षों को अपने-अपने खर्च स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया।
Case Details
Case Title: Angelwoods Apartment Allottees Association v. M Lalitha & Anr.
Case Number: Civil Appeal Nos. 14439–14440 of 2025
Judges: Justice Sanjay Kumar and Justice K. Vinod Chandran
Decision Date: May 12, 2026










