दिल्ली हाईकोर्ट ने आबकारी नीति से जुड़े भ्रष्टाचार मामले में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय देते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की याचिका को खारिज कर दिया। केजरीवाल ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की उस याचिका को दूसरी पीठ में स्थानांतरित करने की मांग की थी जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा उन्हें और अन्य आरोपियों को दी गई राहत को चुनौती दी गई है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि मामले का आवंटन न्यायालय के रोस्टर के अनुसार हुआ है और इसे स्थानांतरित करने का कोई प्रशासनिक कारण नहीं बनता।
Read Also:- एक्साइज पॉलिसी विवाद: जज बदलने की मांग ठुकराए जाने पर केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
दिल्ली सरकार की 2021–22 की आबकारी नीति को लेकर अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए थे। इसके बाद दिल्ली के उपराज्यपाल ने मामले की जांच के लिए सीबीआई को निर्देश दिया था।
जांच एजेंसियों का आरोप था कि नीति के माध्यम से निजी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया और इससे सरकारी राजस्व को नुकसान हुआ। इसी मामले में कई राजनीतिक नेताओं और कारोबारियों के खिलाफ जांच शुरू हुई थी।
27 फरवरी को एक विशेष सीबीआई अदालत ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित कुल 23 आरोपियों को इस मामले में आरोपों से मुक्त कर दिया था। अदालत ने कहा था कि केजरीवाल के खिलाफ लगाए गए आरोप मुख्य रूप से सह-आरोपियों या गवाहों के बयानों पर आधारित थे और उनके खिलाफ स्वतंत्र साक्ष्य नहीं मिले।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने प्रशासनिक स्तर पर स्थानांतरण की मांग को अस्वीकार करते हुए कहा कि मामला मौजूदा रोस्टर के अनुसार जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को सौंपा गया है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पक्ष को न्यायाधीश की निष्पक्षता को लेकर आपत्ति है तो उस पर निर्णय संबंधित न्यायाधीश स्वयं लेते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर मामले को दूसरी पीठ में स्थानांतरित करने का कोई कारण नहीं पाया गया।
मुख्य न्यायाधीश ने केजरीवाल की स्थानांतरण याचिका को खारिज कर दिया। इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका पर आगे की सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ में ही जारी रहेगी।
मामले की सुनवाई में अब ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को दी गई राहत की वैधता और जांच एजेंसी की आपत्तियों पर विचार किया जाएगा।









