विदेश में दिए गए तलाक के आदेश की वैधता पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि यदि विदेशी अदालत का तलाक आदेश उस कानून के आधार पर दिया गया है जो भारत में मान्य नहीं है, तो उसे भारतीय अदालतें मान्यता नहीं देंगी।
हालांकि, लगभग 18 साल से अलग रह रहे पति-पत्नी के विवाद को समाप्त करने के लिए कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 की विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए विवाह को समाप्त घोषित कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला किशोरकुमार मोहन काले बनाम कश्मीरा काले से जुड़ा है। दोनों की शादी 25 दिसंबर 2005 को मुंबई में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। शादी के समय दोनों अमेरिका में रह रहे थे और बाद में वहीं साथ रहने लगे।
कुछ समय बाद वैवाहिक संबंधों में विवाद पैदा हुआ। पत्नी ने सितंबर 2008 में अमेरिका के ओकलैंड काउंटी की सर्किट कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल की।
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फरवरी 2009 में अमेरिकी अदालत ने विवाह समाप्त करते हुए तलाक का आदेश दे दिया और संपत्ति के बंटवारे सहित कुछ आर्थिक निर्देश भी दिए।
इसी बीच पति ने अक्टूबर 2008 में पुणे फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक की याचिका दायर कर दी।
पुणे फैमिली कोर्ट ने 2009 में कहा कि चूंकि शादी भारत में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी, इसलिए हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) लागू होगा और पुणे कोर्ट को मामले की सुनवाई का अधिकार है।
लेकिन पत्नी ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने 2010 में फैसला दिया कि दोनों पति-पत्नी अमेरिका में बसे हुए थे और वहीं अंतिम बार साथ रहे थे, इसलिए अमेरिकी अदालत का अधिकार क्षेत्र सही है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पुणे फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।
इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान विदेशी अदालतों के तलाक आदेश की मान्यता पर महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किए।
पीठ ने कहा कि किसी विदेशी अदालत के तलाक आदेश को भारत में तभी स्वीकार किया जा सकता है जब:
- वह उसी वैवाहिक कानून के आधार पर दिया गया हो जो पक्षों पर लागू होता है
- दोनों पक्षों ने विदेशी अदालत की कार्यवाही में प्रभावी रूप से भाग लिया हो
- प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया गया हो
अदालत ने कहा:
“विदेशी अदालत का तलाक आदेश तभी मान्य होगा जब वह उस वैवाहिक कानून के अनुरूप हो जो पक्षों पर लागू होता है।”
कोर्ट ने पाया कि अमेरिकी अदालत ने विवाह को “irretrievable breakdown of marriage” (विवाह का पूर्ण टूट जाना) के आधार पर समाप्त किया था, जबकि यह आधार हिंदू विवाह अधिनियम में मान्य नहीं है।
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साथ ही, पति ने अमेरिकी अदालत की कार्यवाही में प्रभावी रूप से भाग भी नहीं लिया था।
इन तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अमेरिकी अदालत द्वारा दिया गया तलाक आदेश भारतीय कानून के तहत मान्य नहीं माना जा सकता।
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि पति-पत्नी 2008 से अलग रह रहे हैं और उनके बीच सुलह की कोई संभावना नहीं बची है।
इस स्थिति में कोर्ट ने कहा:
“लगभग अठारह वर्षों से पक्ष अलग रह रहे हैं और वैवाहिक संबंध समाप्त हो चुका है।”
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए विवाह को समाप्त घोषित कर दिया।
इसके साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया गया और मामले का निपटारा कर दिया गया।
Case Title: Kishorekumar Mohan Kale v. Kashmira Kale
Case Number: Civil Appeal No. 1342 of 2013
Decision Date: 15 January 2026










