घरेलू हिंसा और दहेज जैसी मांगों से जुड़े एक गंभीर मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के एक व्यक्ति की हत्या और क्रूरता के मामले में सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि पीड़िता की डाइंग डिक्लेरेशन (मृत्यु से पहले दिया गया बयान), बेटी की प्रत्यक्षदर्शी गवाही और डॉक्टरों की रिपोर्ट जैसे साक्ष्य आरोपी के खिलाफ स्पष्ट रूप से अपराध साबित करते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक दंपत्ति से जुड़ा है, जिनकी शादी को लगभग 17 वर्ष हो चुके थे और उनके चार बच्चे थे। शुरुआत में वैवाहिक जीवन सामान्य था, लेकिन बाद में पति-पत्नी के बीच पैसों को लेकर विवाद बढ़ने लगे।
अभियोजन के अनुसार, पति अक्सर पत्नी से उसके मायके से पैसे लाने की मांग करता था और उसे मारता-पीटता भी था।
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20 जुलाई 2000 की रात दोनों के बीच फिर झगड़ा हुआ। आरोप है कि आरोपी ने गुस्से में केरोसिन लाकर पत्नी पर डाल दिया और मोमबत्ती से आग लगा दी। गंभीर रूप से झुलसी महिला को पड़ोसियों ने अस्पताल पहुंचाया, जहां तीन दिन बाद उसकी मौत हो गई।
महिला के पिता की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी पर हत्या और क्रूरता के आरोप लगाए, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और धारा 498A (पत्नी के साथ क्रूरता) के तहत थे।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा कि जिस बाथरूम में घटना बताई गई, वह बहुत छोटा था और दो लोगों का वहां होना संभव नहीं लगता। साथ ही कुछ गवाहों के बयान भी विरोधाभासी बताए गए।
हालांकि, राज्य सरकार की अपील पर हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य पर्याप्त हैं और आरोपी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
इसके बाद आरोपी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
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सुप्रीम कोर्ट ने मामले के महत्वपूर्ण साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण किया।
सबसे अहम गवाही आरोपी और मृतका की 16 वर्षीय बेटी की थी, जिसने अदालत को बताया कि उसने अपने पिता को केरोसिन लाकर अपनी मां पर डालते और आग लगाते देखा था।
अदालत ने कहा कि इस गवाही में कोई गंभीर विरोधाभास नहीं है और यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि बेटी अपने पिता के खिलाफ झूठ बोलेगी।
पीड़िता का अस्पताल में दर्ज किया गया डाइंग डिक्लेरेशन भी महत्वपूर्ण साक्ष्य माना गया। डॉक्टरों ने प्रमाणित किया था कि महिला बयान देने की स्थिति में थी।
अदालत ने कहा:
“डॉक्टरों के बयान स्पष्ट करते हैं कि पीड़िता गंभीर रूप से झुलसने के बावजूद सचेत अवस्था में थी और उसका बयान रिकॉर्ड किया जा सकता था।”
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पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट में भी पुष्टि हुई कि महिला की मृत्यु 80–90 प्रतिशत जलने से हुए संक्रमण (सेप्टीसीमिया) के कारण हुई।
साथ ही घटनास्थल से केरोसिन का डिब्बा, माचिस और जले हुए कपड़े बरामद किए गए थे, जो अभियोजन के मामले को मजबूत करते हैं।
सभी साक्ष्यों और गवाहियों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ प्रमाण “स्पष्ट और निर्णायक” हैं।
अदालत ने पाया कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को सही तरीके से पलटा था।
पीठ ने कहा कि आरोपी भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 498A के तहत दोषी है और उसे दी गई सजा उचित है।
इसके साथ ही अदालत ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और आदेश दिया कि वह तुरंत आत्मसमर्पण कर शेष सजा पूरी करे।
Case Title: Subramani vs State of Karnataka
Case Number: Criminal Appeal No. 2432 of 2010
Judges: Justice Pankaj Mithal and Justice S.V.N. Bhatti
Decision Date: 17 March 2026
Counsels:
For the Respondent (State of Karnataka): Shri Sanchit Garga, Advocate-on-Record
For the Appellant: Shri Shekhar G. Devasa, Senior Advocate










