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गुजरात हाईकोर्ट ने ₹37 करोड़ के बैंक लेनदेन के आधार पर आयकर पुनर्मूल्यांकन नोटिस रद्द किया

मुकेश मनुभाई शाह बनाम सहायक आयकर आयुक्त, सर्किल-1(1)(1), अहमदाबाद - गुजरात उच्च न्यायालय ने आयकर पुनर्मूल्यांकन रद्द किया, यह माना कि उच्च मूल्य वाली बैंक प्रविष्टियाँ अकेले धारा 148ए के तहत पुन: खोलने को उचित नहीं ठहरा सकतीं।

Shivam Y.
गुजरात हाईकोर्ट ने ₹37 करोड़ के बैंक लेनदेन के आधार पर आयकर पुनर्मूल्यांकन नोटिस रद्द किया

गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में आयकर विभाग द्वारा जारी पुनर्मूल्यांकन (री-असेसमेंट) नोटिस को रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि केवल बैंक खाते में बड़े लेनदेन के आधार पर, बिना ठोस जांच के, आकलन दोबारा खोलना कानून के दायरे से बाहर है।

यह फैसला आकलन वर्ष 2019-20 से जुड़े मामले में आया, जहां करदाता ने नोटिस को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता मुकेश मनुभाई शाह, जो एक निजी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं और कई फर्मों में साझेदार भी हैं, ने 27 अगस्त 2019 को अपना आयकर रिटर्न दाखिल किया था। उन्होंने उस वर्ष ₹33.98 लाख की आय घोषित की थी।

बाद में आयकर विभाग को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) से जानकारी मिली कि वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान उनके बैंक खाते में करीब ₹37.40 करोड़ के डेबिट और क्रेडिट लेनदेन हुए हैं।

इसी जानकारी के आधार पर 30 मार्च 2025 को आयकर विभाग ने धारा 148A(1) के तहत नोटिस जारी कर आकलन दोबारा खोलने की प्रक्रिया शुरू की।

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याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि सभी लेनदेन पूरी तरह बैंकिंग चैनलों के जरिए हुए थे।
कोई भी नकद लेनदेन नहीं था और सभी संबंधित पक्षों के नाम, पते, PAN, ओपनिंग और क्लोजिंग बैलेंस तक की जानकारी पहले ही विभाग को दी जा चुकी थी।

याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि ये लेनदेन मुख्य रूप से अनसिक्योर्ड लोन और उनके पुनर्भुगतान से जुड़े थे, जिन पर दिया गया ब्याज भी कभी टैक्स से घटाया नहीं गया।

उनकी ओर से कहा गया कि विभाग बिना किसी ठोस सामग्री के केवल “शक के आधार” पर जांच करना चाहता है।

आयकर विभाग का पक्ष

आयकर विभाग ने अदालत में दलील दी कि बैंक से प्राप्त सूचना के अनुसार यह हाई-रिस्क ट्रांजैक्शन थे और आशंका है कि आय कर से बची हो सकती है।

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विभाग का कहना था कि याचिकाकर्ता ने कुछ विवरण, जैसे व्यक्तिगत खातों की पूरी जानकारी और पूंजी खाते के दस्तावेज, उपलब्ध नहीं कराए। इसलिए मामले की गहराई से जांच जरूरी है।

अदालत की टिप्पणी

दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने पाया कि:

“सिर्फ बैंक द्वारा दी गई डेबिट और क्रेडिट की कुल राशि को आधार बनाकर यह नहीं कहा जा सकता कि आय कर योग्य आय छिपाई गई है।”

न्यायमूर्ति ए.एस. सुपेहिया और न्यायमूर्ति प्रणव त्रिवेदी कि पीठ ने कहा कि धारा 148A का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आकलन दोबारा खोलने से पहले विभाग के पास ऐसी ठोस जानकारी हो जो आय के छिपे होने की ओर इशारा करे।

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अदालत ने यह भी नोट किया कि:

  • सभी लेनदेन बैंक के जरिए थे
  • नकद लेनदेन का कोई आरोप नहीं था
  • विभाग पहले से ही कई विवरणों के कब्जे में था

इसके बावजूद आकलन अधिकारी ने “रोविंग इन्क्वायरी” यानी बिना ठोस आधार के विस्तृत जांच शुरू कर दी, जो कानूनन सही नहीं है।

अंतिम फैसला

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आयकर अधिकारी ने धारा 148A(1) की सीमा से बाहर जाकर कार्रवाई की।

इसलिए,

  • 30 मार्च 2025 का नोटिस
  • 19 जून 2025 का आदेश
  • और उससे जुड़ा पुनर्मूल्यांकन नोटिस

पूरी तरह रद्द कर दिया गया। याचिका स्वीकार कर ली गई और किसी भी पक्ष पर लागत नहीं लगाई गई।

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