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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 'अमान्य' विश्वविद्यालय की डिग्री पर बर्खास्त लाइब्रेरियन बहाल

प्रियंका कुमारी एवं अन्य बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने ‘अमान्य’ घोषित विश्वविद्यालय की डिग्री पर बर्खास्त लाइब्रेरियन को बहाल किया, कहा छात्रों की गलती नहीं।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 'अमान्य' विश्वविद्यालय की डिग्री पर बर्खास्त लाइब्रेरियन बहाल

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को एक ऐसा मामला सुना गया, जिसने सैकड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल उठाया-क्या किसी विश्वविद्यालय को बाद में अवैध घोषित कर देने से उसके पूर्व छात्रों की डिग्री भी बेकार हो जाएगी?

न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने इस सवाल का साफ जवाब दिया। अदालत ने कहा कि जिन छात्रों ने कानून के तहत स्थापित विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की थी, उन्हें बाद की कानूनी कार्रवाई का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ेगा।

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मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, जिनमें प्रियंका कुमारी और अन्य शामिल हैं, ने छत्तीसगढ़ स्थित University of Technology and Science, Raipur से वर्ष 2004 में बैचलर ऑफ लाइब्रेरी साइंस (B.Lib) की डिग्री प्राप्त की थी। यह विश्वविद्यालय Chhattisgarh Niji Kshetra Vishwavidyalaya Act, 2002 के तहत स्थापित हुआ था।

बाद में 11 फरवरी 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने Prof. Yash Pal v. State of Chhattisgarh में इस अधिनियम की कुछ धाराओं को असंवैधानिक करार दे दिया। इसके परिणामस्वरूप इस कानून के तहत स्थापित सभी निजी विश्वविद्यालयों का अस्तित्व समाप्त हो गया।

हालांकि, अदालत ने उस फैसले में यह भी निर्देश दिया था कि जो छात्र उस समय पढ़ाई कर रहे थे, उनके हितों की रक्षा की जाए और उन्हें अन्य मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों से जोड़ा जाए।

नियुक्ति और विवाद

वर्ष 2009 में बिहार सरकार ने लाइब्रेरियन पद के लिए विज्ञापन निकाला। अपीलकर्ताओं का चयन हुआ और 22 मई 2010 को उनकी नियुक्ति कर दी गई। वे करीब पाँच वर्षों तक सेवा में रहे।

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लेकिन 2015 में उनकी सेवाएं यह कहते हुए समाप्त कर दी गईं कि उनकी डिग्री ऐसे विश्वविद्यालय से है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अमान्य घोषित कर दिया था।

पटना हाई कोर्ट ने भी राज्य सरकार की कार्रवाई को सही ठहराया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

अदालत में दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि जब उन्होंने पढ़ाई की, उस समय विश्वविद्यालय विधिवत स्थापित और मान्यता प्राप्त था। उन्होंने कहा, “छात्रों की कोई गलती नहीं थी। कानून बाद में निरस्त हुआ। ऐसे में डिग्री को अमान्य नहीं माना जा सकता।”

राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि जब अधिनियम ही असंवैधानिक घोषित हो गया, तो उसके तहत दी गई डिग्रियां भी स्वतः अमान्य हो जाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि उस समय विश्वविद्यालय अस्तित्व में था और केंद्र सरकार द्वारा भी पाठ्यक्रमों को मान्यता दी गई थी।

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अदालत ने कहा, “यह राज्य का मामला नहीं है कि विश्वविद्यालय फर्जी था या वहां पढ़ाई नहीं हुई। अपीलकर्ता विधि सम्मत स्थापित संस्थान से पढ़े हैं, इसलिए उन्हें उनकी डिग्री के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।”

पीठ ने यह भी नोट किया कि 2010 में नियुक्ति के समय सरकार को पूरी जानकारी थी कि यह विश्वविद्यालय 2002 अधिनियम के तहत स्थापित था, फिर भी चयन किया गया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने बंबई हाई कोर्ट के एक फैसले का भी जिक्र किया, जहां समान परिस्थिति में छात्र को राहत दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छात्रों को बिना किसी धोखाधड़ी के पढ़ाई पूरी करने के बाद दंडित करना न्यायसंगत नहीं होगा।

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अंतिम निर्णय

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ताओं की सेवाएं समाप्त करने का आदेश अवैध है।

पीठ ने निर्देश दिया कि सभी अपीलकर्ताओं को सेवा में बहाल किया जाए और उनकी निरंतरता (continuity of service) बरकरार रखी जाए।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि “चूंकि इस अवधि में उन्होंने काम नहीं किया है, इसलिए वे बकाया वेतन (back wages) के हकदार नहीं होंगे।”

इसी के साथ तीनों सिविल अपीलें स्वीकार कर ली गईं।

Case Title: Priyanka Kumari & Ors. v. State of Bihar & Ors.

Case No.: Civil Appeal No. 797 of 2026 (with CA 798 & 799 of 2026)

Decision Date: February 18, 2026

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