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हिरण्मय एनर्जी इन्सॉल्वेंसी केस: सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोटर की अपील खारिज की, CIRP बकाया

पावर ट्रस्ट (हिरणमय एनर्जी लिमिटेड के प्रमोटर) बनाम भुवन मदान और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने Hiranmaye Energy Ltd. के खिलाफ CIRP बहाल की, प्रमोटर की अपील खारिज, धारा 10A दलील अस्वीकार।

Vivek G.
हिरण्मय एनर्जी इन्सॉल्वेंसी केस: सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोटर की अपील खारिज की, CIRP बकाया

दिल्ली के कोर्टरूम में बुधवार को माहौल गंभीर था। मामला था एक बड़े पावर प्रोजेक्ट का और उससे जुड़े हजारों करोड़ रुपये के कर्ज का। Supreme Court of India ने आखिरकार हिरण्मय Energy Ltd. के प्रमोटर की अपील खारिज करते हुए साफ कर दिया कि दिवाला प्रक्रिया (CIRP) जारी रहेगी।

यह फैसला जस्टिस जॉयमाल्या बागची की अगुवाई वाली पीठ ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

Hiranmaye Energy Ltd. ने 2013 में एक थर्मल पावर प्लांट लगाने के लिए लगभग 1859 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। बाद में लागत बढ़ने पर अतिरिक्त लोन भी लिया गया। लेकिन 2018 में खाते को एनपीए (गैर-निष्पादित संपत्ति) घोषित कर दिया गया।

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कंपनी और कर्जदाता के बीच 2020 में दो बार कर्ज पुनर्गठन (रीस्ट्रक्चरिंग) की कोशिश हुई। इन प्रस्तावों के तहत भुगतान की नई समय-सारिणी तय की गई थी। मगर कुछ शर्तें - जैसे अनुकूल टैरिफ आदेश, डेब्ट सर्विस रिजर्व अकाउंट बनाना और प्लांट को 72 घंटे लगातार पूरी क्षमता से चलाना - पूरी नहीं हो सकीं।

इसके बाद वित्तीय लेनदार ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की धारा 7 के तहत आवेदन दायर किया।

सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

प्रमोटर की ओर से तर्क दिया गया कि डिफॉल्ट की तारीख 2020-21 में आती है, जो कोविड काल के दौरान लागू धारा 10A की सुरक्षा अवधि में आती है। इस धारा के तहत 25 मार्च 2020 से 24 मार्च 2021 के बीच हुए डिफॉल्ट पर दिवाला प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती।

यह भी कहा गया कि पुनर्गठन समझौते अंतिम और बाध्यकारी थे, इसलिए पुराना लोन समझौता लागू नहीं रहा।

वकील ने कोर्ट में कहा, “कंपनी एक चालू और व्यवहार्य प्रोजेक्ट है। उसके पास 25 साल का पावर परचेज एग्रीमेंट है और वह लगातार बिलिंग कर रही है।”

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अदालत की सख्त टिप्पणी

पीठ ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि डिफॉल्ट 31 मार्च 2018 को हुआ था, जो धारा 10A की अवधि से पहले की तारीख है। पुनर्गठन प्रस्तावों को लेकर कोर्ट ने माना कि वे कभी लागू ही नहीं हुए क्योंकि पूर्व-शर्तें पूरी नहीं हुईं।

पीठ ने कहा, “जब प्री-इम्प्लीमेंटेशन शर्तें पूरी नहीं हुईं, तो पुनर्गठन समझौते वैध और बाध्यकारी नहीं बन सकते।”

अदालत ने यह भी दोहराया कि धारा 7 के तहत आवेदन स्वीकार करते समय न्यायाधिकरण को केवल यह देखना होता है कि कर्ज है और डिफॉल्ट हुआ है या नहीं। कंपनी की व्यावसायिक व्यवहार्यता (viability) पर इस स्तर पर विस्तृत जांच जरूरी नहीं।

इस संदर्भ में कोर्ट ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक बार डिफॉल्ट सिद्ध हो जाए, तो आवेदन स्वीकार करना ही होगा।

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समझौता प्रस्तावों पर क्या कहा गया?

सुनवाई के दौरान प्रमोटर ने कई बार समझौता प्रस्ताव दिए। इनमें 1,101 करोड़ से लेकर 1,671 करोड़ रुपये तक के ऑफर शामिल थे। लेकिन कर्जदाताओं की समिति (CoC) ने इन्हें खारिज कर दिया और Damodar Valley Corporation के प्रस्ताव को मंजूरी दी।

कोर्ट ने साफ कहा कि कर्जदाताओं की “व्यावसायिक समझ” (commercial wisdom) में अदालत दखल नहीं दे सकती।

पीठ ने कहा, “कर्जदाताओं द्वारा स्वीकार किए गए समाधान योजना को अदालत दूसरे विकल्प से तुलना कर पलट नहीं सकती।”

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अंतिम फैसला

लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने प्रमोटर की अपील खारिज कर दी और पहले दी गई CIRP पर रोक भी हटा दी।

इसके साथ ही, कोर्ट ने 125 करोड़ रुपये की वह जमा राशि भी प्रमोटर को वापस करने का निर्देश दिया, जो CIRP पर अस्थायी रोक के दौरान जमा कराई गई थी।

मामला यहीं समाप्त हुआ - अब Hiranmaye Energy Ltd. के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

Case Title: Power Trust (Promoter of Hiranmaye Energy Ltd.) v. Bhuvan Madan & Ors.

Case No.: Civil Appeal No. 2211 of 2024

Decision Date: February 18, 2026

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