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ड्यूटी के दौरान पैर गंवाने वाले कर्मचारी को 38 साल बाद इंसाफ, हाईकोर्ट ने ALM मानकर सभी लाभ देने का आदेश

मोहन लाल (मृतक) एलआरएस बनाम ए.ई.ई./टी एंड एस.डब्ल्यू. कार्यशाला और अन्य के माध्यम से। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 1988 हादसे में दिव्यांग हुए कर्मचारी को ALM मानकर सभी सेवा लाभ व 6% ब्याज देने का आदेश दिया।

Vivek G.
ड्यूटी के दौरान पैर गंवाने वाले कर्मचारी को 38 साल बाद इंसाफ, हाईकोर्ट ने ALM मानकर सभी लाभ देने का आदेश

चंडीगढ़ स्थित पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में मंगलवार को एक लंबे इंतज़ार का अंत हुआ। अदालत ने 1988 में ड्यूटी के दौरान दुर्घटना में पैर गंवाने वाले कर्मचारी मोहन लाल को आखिरकार वह हक दे दिया, जिसके लिए वह जीवनभर लड़ते रहे।

न्यायमूर्ति नमित कुमार की पीठ ने साफ कहा कि विभाग का रवैया “मनमाना और भेदभावपूर्ण” था और इसे कानून के दायरे में सही नहीं ठहराया जा सकता।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला RSA No.3427 of 1998 और उससे जुड़ी CWP No.1076 of 2011 से जुड़ा है।

रिकॉर्ड के अनुसार, मोहन लाल ने मई 1980 में हरियाणा स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (अब Uttar Haryana Bijli Vitran Nigam Limited) में दैनिक वेतन भोगी के रूप में काम शुरू किया। 15 दिसंबर 1982 को उन्हें टी-मेट के पद पर पदोन्नत किया गया।

21 अप्रैल 1988 को बिजली के खंभे की मरम्मत करते समय उन्हें करंट लगा। हादसा इतना गंभीर था कि उनका बायां पैर काटना पड़ा। वह लंबी अवधि तक पीजीआई चंडीगढ़ में इलाजरत रहे।

इलाज के दौरान 16 अगस्त 1988 को उन्हें ए.एल.एम. (Assistant Lineman) के पद पर नियमित नियुक्ति का प्रस्ताव मिला, लेकिन बीमारी के कारण जॉइन नहीं कर सके और 27 सितंबर 1988 को यह प्रस्ताव रद्द कर दिया गया ।

बाद में 23 दिसंबर 1992 को हेल्पर ग्रेड-II का प्रस्ताव भी दिया गया, जो फिर वापस ले लिया गया। अंततः उन्हें 1992 में वर्क-चार्ज टी-मेट के रूप में काम पर रखा गया।

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जूनियर्स को मिला प्रमोशन, सीनियर को नहीं

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि मोहन लाल से जूनियर कई कर्मचारी, जो स्थायी रूप से दिव्यांग हो चुके थे, उन्हें ए.एल.एम. पद पर पदोन्नत कर दिया गया।

अदालत ने इस पर सख्त टिप्पणी की।

पीठ ने कहा, “जब विभाग ने समान परिस्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को पदोन्नति दी, तो अपीलकर्ता को अलग रखना न्यायसंगत नहीं है।”

न्यायालय ने यह भी नोट किया कि विभाग ने यह नहीं बताया कि मोहन लाल के साथ अलग व्यवहार क्यों किया गया ।

अपीलीय अदालत का फैसला पलटा

ट्रायल कोर्ट ने पहले मोहन लाल के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें ए.एल.एम. पद का लाभ देने का निर्देश दिया था। लेकिन प्रथम अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए फैसला पलट दिया कि कर्मचारी ने वर्क-चार्ज पद स्वीकार कर लिया था और मुआवजा भी लिया था।

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हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।

पीठ ने कहा, “किसी कर्मचारी को उसकी शारीरिक अक्षमता के आधार पर पदोन्नति से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वही विभाग अन्य दिव्यांग कर्मचारियों को पदोन्नत कर चुका हो।”

पत्नी की याचिका पर भी राहत

मोहन लाल का 2009 में निधन हो गया। उनकी पत्नी ने 2011 में अलग से याचिका दायर कर अनुग्रह (ex-gratia) लाभ की मांग की थी। विभाग का कहना था कि चूंकि सेवा नियमित नहीं थी, इसलिए लाभ नहीं मिल सकता।

लेकिन अदालत ने कहा कि चूंकि अब मोहन लाल को 16 अगस्त 1988 से नियमित ए.एल.एम. माना जा रहा है, इसलिए परिवार को 2006 की नीति के तहत सभी अनुग्रह लाभ दिए जाएं ।

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अदालत का अंतिम आदेश

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि:

  • मोहन लाल को 16 अगस्त 1988 से ए.एल.एम. पद पर नियमित कर्मचारी माना जाए।
  • सभी सेवा लाभ और बकाया राशि दी जाए।
  • 6% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान किया जाए।
  • चार महीने के भीतर कानूनी वारिसों को सभी लाभ जारी किए जाएं ।

पीठ ने अपने निष्कर्ष में कहा कि विभाग का आचरण “अवैध, मनमाना और समानता के सिद्धांतों के खिलाफ” था।

करीब चार दशक पुरानी लड़ाई आखिरकार यहीं खत्म हुई-अदालत के इस आदेश के साथ।

Case Title: Mohan Lal (deceased) through LRs vs A.E.E./T & S.W. Workshop & Ors.

Case No.: RSA No.3427 of 1998 & CWP No.1076 of 2011

Case Type: Regular Second Appeal & Writ Petition

Decision Date: 03 February 2026

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