औरंगाबाद बेंच में मंगलवार की सुबह माहौल शांत था, लेकिन सुनवाई का मुद्दा बेहद संवेदनशील। एक 12 साल की बच्ची, उसकी एकल मां और स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज एक ऐसी पहचान-जो अब उसकी जिंदगी से मेल नहीं खाती।
Bombay High Court की खंडपीठ-न्यायमूर्ति विभा कंकनवाड़ी और न्यायमूर्ति हितेन एस. वेनेगावकर-ने इस मामले में अहम फैसला सुनाया। अदालत ने साफ कहा, “राज्य के रिकॉर्ड बच्चे की गरिमा के खिलाफ नहीं खड़े हो सकते।”
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मामले की पृष्ठभूमि
याचिका एक नाबालिग छात्रा और उसकी मां ने दायर की थी। बच्ची कक्षा 6 में पढ़ती है। जन्म के समय उसके जैविक पिता का नाम जन्म प्रमाणपत्र में दर्ज हुआ और वही नाम आगे स्कूल रिकॉर्ड में चला गया।
लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल गईं। रिकॉर्ड के अनुसार, पिता एक आपराधिक मामले में आरोपी हैं। समझौते के बाद बच्ची की स्थायी अभिरक्षा मां के पास रही और पिता ने भविष्य में किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी से खुद को अलग कर लिया।
मां ने राजपत्र (Gazette) में नाम परिवर्तन की सूचना प्रकाशित कराई और स्कूल से रिकॉर्ड सुधारने का अनुरोध किया। 2 जून 2025 को शिक्षा अधिकारी ने यह कहते हुए प्रस्ताव खारिज कर दिया कि सेकेंडरी स्कूल कोड में ऐसी अनुमति नहीं है।
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अदालत की अहम टिप्पणियां
पीठ ने सबसे पहले नाम सुधार के प्रश्न पर विचार किया। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक रिकॉर्ड “पत्थर की लकीर” नहीं होते।
“यदि बच्ची अपनी मां के संरक्षण में पल रही है और पिता की कोई भूमिका नहीं है, तो केवल पुराने फॉर्मेट के आधार पर पिता का नाम बनाए रखना उचित नहीं,” अदालत ने कहा।
अदालत ने 2019 के फुल बेंच फैसले-Janabai d/o Himmatrao Thakur v. State of Maharashtra-का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि नाम, उपनाम या जाति में स्पष्ट त्रुटि होने पर सुधार संभव है।
जाति सुधार पर संवैधानिक दृष्टिकोण
मामले का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा था-जाति प्रविष्टि का संशोधन। स्कूल रिकॉर्ड में बच्ची की जाति “मराठा” दर्ज थी, जबकि मां “अनुसूचित जाति - महार” समुदाय से हैं।
राज्य का तर्क था कि जाति सामान्यतः पिता से चलती है।
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लेकिन अदालत ने कहा कि यह कोई कठोर नियम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले-Rameshbhai Dabhai Naika v. State of Gujarat-का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया कि जाति निर्धारण में सामाजिक परवरिश और वास्तविक परिस्थितियां देखी जानी चाहिए।
न्यायालय ने कहा, “बच्ची पूरी तरह अपनी मां के सामाजिक वातावरण में पली-बढ़ी है। ऐसे में केवल जैविक आधार पर पिता की जाति थोपना संविधान के समानता सिद्धांत के विपरीत होगा।”
पीठ ने आगे कहा कि “एकल मां को पूर्ण अभिभावक के रूप में मान्यता देना दया नहीं, बल्कि संवैधानिक निष्ठा है।”
शिक्षा और गरिमा का सवाल
अदालत ने विशेष रूप से बच्ची की गरिमा और भविष्य पर जोर दिया।
“स्कूल रिकॉर्ड कोई निजी कागज नहीं है। यह दस्तावेज बच्चे के साथ जीवन भर चलता है। यदि रिकॉर्ड वास्तविक सामाजिक स्थिति से मेल नहीं खाता, तो वह बच्चे के लिए बोझ बन सकता है,” अदालत ने टिप्पणी की।
हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूल स्वयं जाति प्रमाणपत्र जारी नहीं करेगा। मां को विधिवत आवेदन कर सक्षम प्राधिकारी से जाति प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा।
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अदालत का अंतिम आदेश
खंडपीठ ने 2 जून 2025 का अस्वीकृति आदेश रद्द कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिए कि:
- स्कूल बच्ची के नाम और उपनाम में मां का नाम प्रतिस्थापित करे।
- स्कूल रिकॉर्ड में जाति “Scheduled Caste – Mahar” दर्ज की जाए।
- मां को अपनी बेटी के लिए जाति प्रमाणपत्र हेतु आवेदन करने की अनुमति दी जाए।
- संबंधित अधिकारी सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुरूप, तथ्यों के आधार पर आवेदन का निपटारा करें।
- पूरी प्रक्रिया में बच्ची को किसी प्रकार की शर्मिंदगी या भेदभाव का सामना न करना पड़े।
याचिका इन निर्देशों के साथ मंजूर कर ली गई।
Case Title: X.Y.Z. & Anr. v. State of Maharashtra & Ors.
Case No.: Writ Petition No. 15528 of 2025
Decision Date: 02 February 2026










