रांची की ठंडी सुबह में जब मामला पुकारा गया, तो अदालत कक्ष में असामान्य खामोशी थी। मुद्दा बेहद संवेदनशील था-हिरासत में मौत।
झारखंड हाई कोर्ट ने बुधवार को राज्य सरकार से साफ शब्दों में पूछा कि 2018 से 2025 के बीच हुई 437 पुलिस या न्यायिक हिरासत में मौतों में क्या हर मामले में न्यायिक जांच कराई गई थी?
मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ ने राज्य के गृह सचिव को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
Read also:- पुराने आपराधिक मामले के बावजूद नौकरी का हक: गुजरात HC ने भर्ती रोके जाने का आदेश किया रद्द
मामले की पृष्ठभूमि
यह जनहित याचिका मोहम्मद मुमताज अंसारी की ओर से दायर की गई है। याचिका में मांग की गई है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1-A) के तहत हिरासत में मौत, गुमशुदगी या महिला के साथ दुष्कर्म के मामलों में अनिवार्य रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेट से जांच कराई जाए।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में कहा, “कानून साफ कहता है कि पुलिस जांच के अलावा न्यायिक जांच जरूरी है, लेकिन अधिकतर मामलों में यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।”
अदालत के समक्ष गृह विभाग की प्रधान सचिव वंदना डाडेल द्वारा दाखिल हलफनामे के साथ एक चार्ट प्रस्तुत किया गया। इस चार्ट में 2018 से 2025 के बीच 437 मौतों का उल्लेख है। हालांकि, उसमें यह स्पष्ट नहीं था कि इन मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा अलग से जांच की गई या नहीं।
कानून क्या कहता है?
धारा 176(1-A) स्पष्ट करती है कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस या न्यायिक हिरासत में मरता है, गायब होता है या महिला के साथ दुष्कर्म का आरोप होता है, तो पुलिस जांच के अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा स्वतंत्र जांच अनिवार्य है।
इसके समान प्रावधान अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 196 में भी मौजूद हैं। इसमें मृतक के परिजनों को सूचित करने और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया को 24 घंटे के भीतर पूरा करने जैसी सुरक्षा व्यवस्था भी शामिल है।
पीठ ने टिप्पणी की, “यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि इन 437 मामलों में न्यायिक जांच हुई या नहीं। केवल पुलिस जांच पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।”
अदालत की कड़ी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि प्रस्तुत चार्ट से यह स्पष्ट नहीं है कि मौत के कारण का निर्धारण किसने किया-पुलिस ने या न्यायिक जांच के बाद निष्कर्ष निकाला गया।
पीठ ने कहा, “मौतों की संख्या को देखते हुए यह देखना जरूरी है कि कानून द्वारा दिए गए सुरक्षा उपायों का पालन हुआ या नहीं।”
अदालत ने यह भी पूछा कि क्या इन मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशा-निर्देशों का पालन किया गया।
याचिकाकर्ता के वकील ने दावा किया कि “अधिकांश मामलों में न तो न्यायिक जांच हुई और न ही मृतक के परिजनों को किसी जांच की जानकारी दी गई।”
अदालत का निर्देश
अंत में, पीठ ने झारखंड सरकार के गृह सचिव को निर्देश दिया कि वे 13 मार्च 2026 तक विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। इसमें निम्न बिंदुओं की स्पष्ट जानकारी हो:
- 437 मौतों में से किन मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच हुई।
- यदि जांच नहीं हुई, तो उसके कारण।
- 2023 से 2025 के मामलों में BNSS के प्रावधानों का अनुपालन।
- NHRC दिशानिर्देशों का पालन हुआ या नहीं।
अदालत ने कहा कि हलफनामे की प्रति याचिकाकर्ता के वकील को अग्रिम रूप से उपलब्ध कराई जाए। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी।
सुनवाई समाप्त होते-होते अदालत कक्ष में फिर वही गंभीरता लौट आई। अब निगाहें राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं।
Case Title: Md. Mumtaz Ansari vs State of Jharkhand & Others
Case No.: W.P. (PIL) No. 1218 of 2022
Decision Date: 16 February 2026










