धारवाड़ बेंच में गुरुवार की सुबह अदालत कक्ष में हलचल कुछ अलग थी। मामला था एटीएम कार्ड क्लोनिंग और बैंक खातों से अवैध निकासी का। करीब एक दशक पुराने इस केस में सजा काट रहे दो आरोपियों की याचिका पर सुनवाई पूरी हुई। अंत में अदालत ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन सजा में अहम राहत दे दी।
मामले की पृष्ठभूमि
सहदेवप्रसाद उर्फ प्रसाद और जयभाधाकुमार पर आरोप था कि उन्होंने तीन लोगों-गवाह संख्या 1, 5 और 6-के एटीएम कार्ड की जानकारी चुराकर उनके खातों से रकम निकाली।
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ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2013 में उन्हें सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(सी) (पहचान की चोरी) और भारतीय दंड संहिता की धारा 380/34 (साझा मंशा से चोरी) के तहत दोषी ठहराया। तीन वर्ष और दो वर्ष की साधारण कारावास की सजा के साथ जुर्माना भी लगाया गया।
अपील अदालत ने भी 2015 में सजा और दोषसिद्धि को सही माना। इसके बाद आरोपी हाईकोर्ट पहुंचे।
याचिकाकर्ताओं की दलील
बचाव पक्ष के वकील ने अदालत में कहा कि:
- आरोपियों की पहचान के लिए कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई।
- बैंक स्टेटमेंट पेश नहीं किए गए, जिससे अवैध निकासी साबित हो सके।
- बरामदगी के पंच गवाह मुकर गए।
- शिकायत में शुरू में आरोपियों का नाम नहीं था।
वकील ने कहा, “मेरे मुवक्किल पहली बार अपराध में फंसे हैं। यदि अदालत दोषसिद्धि बरकरार रखती है, तो कम से कम सजा में राहत दी जाए।”
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राज्य का पक्ष
सरकारी वकील ने इसका विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि आरोपियों ने तकनीक का दुरुपयोग कर कार्ड क्लोनिंग की और खाताधारकों की पासवर्ड जानकारी चुराई।
अदालत में कहा गया, “यह साधारण चोरी नहीं है, बल्कि तकनीक के जरिए किया गया सुनियोजित अपराध है।”
अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद ने रिकॉर्ड का बारीकी से परीक्षण किया। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत ने सबूतों का सही मूल्यांकन किया है।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जांच अधिकारी ने पर्याप्त सामग्री जुटाई थी, जिससे यह साबित होता है कि आरोपियों ने एटीएम कार्ड डुप्लीकेट कर पैसे निकाले।
हालांकि, अदालत ने एक मानवीय दृष्टिकोण भी अपनाया। आदेश में टिप्पणी की गई:
“हर अपराधी का एक भविष्य होता है। आपराधिक न्याय व्यवस्था को अपराध से नफरत करनी चाहिए, अपराधी से नहीं।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों आरोपी प्रथम अपराधी हैं और लगभग 41 दिन न्यायिक हिरासत में रह चुके हैं।
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सजा में संशोधन
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा। लेकिन शेष कारावास अवधि को हटाते हुए जुर्माने की राशि बढ़ा दी।
अदालत ने आदेश दिया कि:
- प्रत्येक आरोपी 2 लाख रुपये जुर्माना 20 फरवरी 2026 तक जमा करे।
- यदि राशि जमा नहीं की गई, तो उन्हें शेष सजा काटनी होगी।
- वसूली गई राशि में से 50,000 रुपये गवाह 1 और 5 को तथा 25,000 रुपये गवाह 6 को मुआवजे के रूप में दिए जाएं।
- बाकी राशि राज्य के खर्च के लिए जाएगी।
इस प्रकार, अदालत ने सजा को आर्थिक दंड में परिवर्तित करते हुए राहत दी, लेकिन अपराध की गंभीरता को भी नजरअंदाज नहीं किया।
Case Title: Sahadevprasad @ Prasad & Anr. vs State of Karnataka
Case No.: CRL.RP No. 100019 of 2025
Decision Date: 23 January 2026









