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मद्रास हाईकोर्ट ने बार काउंसिल का अस्वीकार आदेश रद्द किया, नीलगिरी महिला वकीलों संघ को मान्यता देने का निर्देश

नीलगिरी महिला वकील संघ बनाम सचिव, तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल और अन्य - मद्रास उच्च न्यायालय ने बार काउंसिल के आदेश को रद्द कर दिया, कल्याण निधि अधिनियम के तहत 15 दिनों के भीतर नीलगिरी महिला वकील संघ को मान्यता देने का निर्देश दिया।

Shivam Y.
मद्रास हाईकोर्ट ने बार काउंसिल का अस्वीकार आदेश रद्द किया, नीलगिरी महिला वकीलों संघ को मान्यता देने का निर्देश

एक अहम फैसले में, मद्रास हाईकोर्ट ने नीलगिरी महिला वकीलों संघ के पक्ष में निर्णय सुनाया, जिसे तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल ने मान्यता देने से इंकार कर दिया था।

जस्टिस एम.एस. रमेश और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने बार काउंसिल का प्रस्ताव खारिज कर दिया और उसे निर्देश दिया कि संघ के आवेदन पर केवल वैधानिक आधारों पर पुनर्विचार किया जाए।

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पृष्ठभूमि

वरिष्ठ अधिवक्ता टी. मुरुगामणिक्कम की दलील थी कि नीलगिरी की महिला अधिवक्ताओं का यह संघ विधिवत तमिलनाडु सोसाइटीज़ पंजीकरण अधिनियम, 1975 के तहत पंजीकृत है। इसके बावजूद, तमिलनाडु अधिवक्ता कल्याण कोष अधिनियम, 1987 की धारा 13 के तहत मान्यता के लिए उनका आवेदन, बार काउंसिल ने प्रस्ताव संख्या 664/2023 द्वारा अस्वीकृत कर दिया।

अस्वीकृति का आधार एक निरीक्षण था, जिसमें बार काउंसिल ने पाया कि अधिकांश महिला अधिवक्ता नीलगिरी जिला बार एसोसिएशन में ही रहना चाहती हैं। काउंसिल ने यह तर्क भी दिया कि वह एक ही न्यायालय केंद्र में केवल एक संघ को मान्यता देती है। बार काउंसिल और नीलगिरी जिला बार एसोसिएशन के वकीलों ने इस रुख का समर्थन किया, साथ ही याचिकाकर्ता द्वारा बताए गए सदस्यों की संख्या पर सवाल उठाए और महिला अधिवक्ताओं में आंतरिक विवाद का हवाला दिया।

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पीठ ने बार काउंसिल के दृष्टिकोण की तीखी आलोचना की। जस्टिस रमेश ने कहा, "बार काउंसिल ने अपनी शक्तियों का अतिक्रमण किया है," और यह भी स्पष्ट किया कि कल्याण कोष नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि विशेष कारण दर्ज करके एक ही न्यायालय केंद्र में एक से अधिक बार एसोसिएशन को मान्यता दी जा सकती है।

न्यायाधीशों ने याद दिलाया कि कानून किसी संघ के गठन के लिए न्यूनतम सदस्यों की संख्या तय नहीं करता। अदालत ने इस बात को भी अनुचित बताया कि बार काउंसिल ने पहले से मौजूद नीलगिरी बार एसोसिएशन की राय मांगी। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि प्रतिद्वंदी समूहों की इस प्रक्रिया में कोई वैधानिक भूमिका नहीं है।

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2015 के एक फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:

"सख्ती से देखा जाए तो अधिनियम उस स्थिति की कल्पना नहीं करता, जहां बार काउंसिल को किसी नए संघ की मान्यता पर विचार करते समय पहले से मान्यता प्राप्त संघों की राय लेनी पड़े।"

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 18.10.2023 का बार काउंसिल का प्रस्ताव रद्द कर दिया। न्यायाधीशों ने बार काउंसिल को निर्देश दिया कि नीलगिरी महिला वकीलों संघ के आवेदन पर 15 दिनों के भीतर पुनर्विचार करे और जांच केवल वैधानिक आवश्यकताओं तक सीमित रखे - क्या संघ के उपनियम सही हैं, पदाधिकारियों का विवरण, सदस्यों की अद्यतन सूची और उनके अभ्यास स्थल उपलब्ध हैं या नहीं।

यदि ये शर्तें पूरी होती हैं, तो अदालत ने स्पष्ट किया कि मान्यता "तुरंत दी जानी चाहिए।"

केस का शीर्षक: नीलगिरी महिला वकील संघ बनाम सचिव, तमिलनाडु एवं पुडुचेरी बार काउंसिल एवं अन्य।

केस संख्या: 2025 का डब्ल्यू.पी. संख्या 6176

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